By, Shrikant Pratyush
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पाटलिपुत्र सीट बनी गले की हड्डी, क्या राम कृपाल के बाद भाई वीरेंद्र को खोएगा राजद

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इस सीट पर मीसा भारती को करारी शिकस्त देकर राम कृपाल यादव लोकसभा पहुंचे और अभी मंत्री पद की शोभा भी बढ़ा रहे हैं। इस हार से तिलमिलाए लालू प्रसाद ने अपनी जादुई राजनीतिक तिकड़म से मीसा भारती को राज्यसभा सांसद बना डाला। अब वही लोकसभा सीट राजद के लिए हॉट केक बन गया है।

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पाटलिपुत्र सीट बनी गले की हड्डी,क्या राम कृपाल के बाद भाई वीरेंद्र को खोएगा राजद

सिटी पोस्ट लाइव “विशेष” : इस साल होने वाले लोकसभा चुनाव में सीट शेयरिंग को लेकर अभी महागठबंधन में सुनामी आनी बाँकी है। लेकिन इस आशंकाओं से सनी सुनामी से पहले पाटलिपुत्र सीट के लिए बबंडर का आगाज हो चुका है। यह वही सीट है जिसके लिए लालू प्रसाद यादव ने अपने अति प्रिय भक्त हनुमान यानि राम कृपाल यादव की बलि दे डाली थी। लालू ने अपने पूरे खानदान को राजनीति में शेटल करने की गरज से इस सीट से अपनी लाडली बेटी मीसा भारती को टिकट दिया था। वर्षों की भक्ति रामकृपाल को कोई मीठा फल नहीं दे सका और इस रूठे भक्त ने लालू मंदिर को छोड़कर भाजपा के मंदिर का पुजारी बनना पसंद किया। इस सीट पर मीसा भारती को करारी शिकस्त देकर राम कृपाल यादव लोकसभा पहुंचे और अभी मंत्री पद की शोभा भी बढ़ा रहे हैं। इस हार से तिलमिलाए लालू प्रसाद ने अपनी जादुई राजनीतिक तिकड़म से मीसा भारती को राज्यसभा सांसद बना डाला। अब वही लोकसभा सीट राजद के लिए हॉट केक बन गया है।

लालू खेमे में भाई वीरेंद्र, राम कृपाल के बाद छोटे ही सही लेकिन हनुमान का ही दर्जा रखते हैं। विभिन्य मंचों से लालू प्रसाद के नाम का जयकारा लगाने वाले और दहाड़ मारने वाले भाई वीरेंद्र अब राज्य की राजनीति से ऊपर देश की राजनीति में अपना हाथ आजमाना चाहते हैं। उनकी नजर पाटलिपुत्र सीट पर जाकर ठहर और जम गई है। एक तरह से भाई वीरेंद्र ने पाटलिपुत्र सीट से लोकसभा चुनाव लड़ने की अपनी इच्छा जाहिर कर दी है। अब इसको लेकर तूफान उठने शुरू हैं। अपनी पत्नी ऐश्वर्या से तनातनी कर वृंदावन और काशी के तीर्थंकर तेज प्रताप यादव ने अपनी दीदी मीसा भारती को पाटलिपुत्र सीट से चुनाव लड़ने का एलान कर दिया है। हांलांकि इस मामले में तेजस्वी यादव बड़ी चतुराई से इस सीट को लालू प्रसाद के फैसले पर छोड़ने की बात कर रहे हैं। नीतीश से गठबंधन के बाद लालू प्रसाद यादव ने राजनीति में परिवार मोह को खासा तवज्जो देकर अपने दोनों बेटों को पहले विधायक बनवाया और फिर तेजस्वी को डिप्टी सीएम और तेज प्रताप यादव को स्वास्थ्य मंत्री बनवा डाला।

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पुत्र मोह में राज्य हित हासिये पर चला गया। एक तो लालू प्रसाद ने अपने बेटों को विधायक बनाने में जल्दबाजी दिखाई, वहीं दूसरी तरफ दोनों बेटों को मंत्री बनवाकर बड़ी राजनीतिक गलती की।लालू के दोनों बेटे अगर सिर्फ विधायक रहकर राजनीति का सटीक गुड़ सीखते, तो यह उनके बेहतर राजनीतिक भविष्य के लिए मिल का पत्थर साबित होता। उस समय तेजस्वी यादव की जगह अब्दुल बारी सिद्दीकी को डिप्टी सीएम बनाया जाना चाहिए था। लालू के दोनों बेटे बेहतर शिक्षा से अनभिज्ञ रहे हैं और अलग धरा से आये हैं। लालू प्रसाद यादव को परिवार मोह ने वह सब करा डाला,जो उन्हें कतई नहीं करना चाहिए था। अब लड़ाई एनडीए बनाम महागठबंधन है। यह गुड्डे-गुड़िया का खेल नहीं होगा। अब गम्भीर और दूरदर्शी फैसले लेने की जरूरत है।

अभी जिस तरह से पाटलिपुत्र सीट पर रस्साकसी शुरू हुई है वह राजद और महागठबंधन की सेहत के लिए कहीं से भी मुफीद नहीं दिख रहा है। भाई वीरेंद्र का राजद में अपना दबदबा और एक अलग हैसियत है। उन्हें कमतर आंक कर कोई फैसला लेने से राजद की डगर निसन्देह कठिन हो जाएगी। अधिक खींचतान में कहीं ऐसा ना हो कि राम कृपाल की तरह लालू प्रसाद के दूसरे हनुमान भाई वीरेंद्र भी मंदिर बदलकर,वहां पूजा शुरू कर दें। कुल मिलाकर देखें तो, तेजस्वी यादव में राजनीतिज्ञ होने के गुण अब दिखने लगे हैं लेकिन अभी उसे तराशने में और वक्त लगेंगे। पार्टी के बड़े और बौद्धिक नेताओं से तेजस्वी को सलाह लेते रहने की जरूरत है। छोटी सी चूक भी बड़ी दुर्घटना की वजह बन जाती है। समय रहते, जागकर और ठोक-बजाकर फैसले लेने की जरूरत है। नहीं तो “का वर्षा जब कृषि सुखानी”।

पीटीएन न्यूज मीडिया ग्रुप के सीनियर एडिटर मुकेश कुमार सिंह की “विशेष” रिपोर्ट

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