By, Shrikant Pratyush
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BJP के लिए क्यों जरुरी हैं नीतीश, इस साल बिहार तय करेगा BJP का भविष्य

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आखिर अमित शाह बार बार क्यों दुहरा रहे हैं कि बिहार में NDA नीतीश कुमार के नेत्रित्व में ही चुनाव लडेगा. दरअसल, लोक सभा चुनाव के बाद अति-उत्साहित अमित शाह को देश के विभिन्न राज्यों में हुए चुनाव में मिली असफलता से ये लगने लगा है कि सहयोगियों पर दबाव बनाना पार्टी के लिए महंगा सौदा साबित हो सकता है.

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BJP के लिए क्यों जरुरी हैं नीतीश, इस साल बिहार तय करेगा BJP का भविष्य

सिटी पोस्ट लाइव : आखिर अमित शाह बार बार क्यों दुहरा रहे हैं कि बिहार में NDA नीतीश कुमार के नेत्रित्व में ही चुनाव लडेगा. दरअसल, लोक सभा चुनाव के बाद अति-उत्साहित अमित शाह को देश के विभिन्न राज्यों में हुए चुनाव में मिली असफलता से ये लगने लगा है कि सहयोगियों पर दबाव बनाना पार्टी के लिए महंगा सौदा साबित हो सकता है. महाराष्ट्र की तरह सहयोगी छिटक सकते हैं और पार्टी सत्ता से बेदखल हो सकती है.

इस साल दो महत्वपूर्ण राज्यों में चुनाव हैं- दिल्ली और बिहार में. बीजेपी के लिए दोनों राज्य बेहद महत्वपूर्ण हैं और ईन दोनों चुनाव में जीत हार का सारा दारोमदार बिहारियों पर है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बिहार विधानसभा का चुनाव मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में जेडी(यू) के साथ गठबंधन में रहकर लड़ने का ऐलान तो किया ही है साथ ही दिल्ली के चुनाव में भी तालमेल की कोशिश जारी है.जाहिर है कुछ राज्यों में चुनावी मात खाने के बाद बीजेपी को अब समझ में आने लगी है कि ज्यादा महत्वाकांक्षी होना उसे महंगा पड़ सकता है. अब वह समझौता के रास्ते पर दिख रही है.

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गौरतलब है कि बीजेपी के हाथ से सबसे पहले 2018 में मध्य प्रदेश की सत्ता निकली. उसके बाद छत्तीसगढ़, राजस्थान, महाराष्ट्र और झारखंड तक सिलसिला जारी रहा. पिछले वर्ष लोकसभा चुनाव में भगवा दल को 303 सीटों का जबर्दस्त समर्थन प्राप्त हुआ और पिछले वर्ष ही महाराष्ट्र, झारखंड हाथ से निकल भी गया. महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री पद को लेकर मची रार में सबसे पुराने साथी शिवसेना को बीजेपी ने खो दिया.अब वह बिहार में नीतीश कुमार को खो देने के मूड में नहीं है.

सबसे ख़ास बात ,राज्यसभा में बीजेपी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को बहुमत नहीं है. इसी वर्ष बिहार से राज्यसभा की पांच सीटें खाली हो रही हैं. फिर 2022 में पांच और सीटें खाली होंगी. ऐसे में बीजेपी के हाथ से बिहार निकलने का मतलब है कि उसे राज्यसभा में भी तगड़ा झटका लगेगा. शिवसेना का साथ छोड़ने से उसके तीन राज्यसभा सांसदों का साथ भी एनडीए को नहीं मिलने वाला.

दो दशकों से भी ज्यादा वक्त से बीजेपी दिल्ली की सत्ता से दूर है. राष्ट्रीय राजधानी में बिहारी वोटरों की बड़ी संख्या है. आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली में बिहारियों की आबादी कुल 31 प्रतिशत है जो 2001 में 14 प्रतिशत थी. बिहार छोड़ने वालों की सबसे बड़ी आबादी 18.3 प्रतिशत दिल्ली आती है और इनमें 40 प्रतिशत यहां के दो जिलों नॉर्थ वेस्ट और वेस्ट में निवास करती है.

यही वजह है कि बीजेपी दिल्ली में भी जेडी(यू) को कुछ सीटें देने पर विचार कर रही है. इतना ही नहीं, उसने प्रदेश बीजेपी का अध्यक्ष भी भोजपुरी अभिनेता मनोज तिवारी को बना रखा है. इन सब कवायद का मकसद पूर्वांचलियों को रिझाना है. कांग्रेस ने भी बिहार में अपने गठबंधन साथी राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) को दिल्ली विधानसभा चुनाव में 4 सीट दे चुकी है.

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