By, Shrikant Pratyush
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अपने नेताओं की बात भी नहीं सुन रहे तेजस्वी? हारने के लिए खेलते रहे हैं आरजेडी के कर्ता-धर्ता

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राजनीति और क्रिकेट में एक समानता यह होती है कि दोनो अनिश्चितताओं का खेल है दोनों के बारे में अंतिम समय तक कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन सियासत कई मायनों में क्रिकेट से अलग होती है। यहां आउट हुआ खिलाड़ी भी दुबारा खेल सकता है और सियासत का खेल यह आजादी भी देती है कि जीत की संभावनाओं को और मजबूत करनी हो तो आप सामने वाली टीम से भी कुछ खिलाड़ी को अपने पाले में ला सकते हैं।

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अपने नेताओं की बात भी नहीं सुन रहे तेजस्वी? हारने के लिए खेलते रहे हैं आरजेडी के  कर्ता-धर्ता

सिटी पोस्ट लाइवः राजनीति और क्रिकेट में एक समानता यह होती है कि दोनो अनिश्चितताओं का खेल है दोनों के बारे में अंतिम समय तक कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन सियासत कई मायनों में क्रिकेट से अलग होती है। यहां आउट हुआ खिलाड़ी भी दुबारा खेल सकता है और सियासत का खेल यह आजादी भी देती है कि जीत की संभावनाओं को और मजबूत करनी हो तो आप सामने वाली टीम से भी कुछ खिलाड़ी को अपने पाले में ला सकते हैं।

क्रिकेट की पिच से सियासत की पिच तक का सफर तय करने वाले तेजस्वी संभवतः क्रिकेट और सियासत के खेल के बारीक फर्क को समझने में गलती करते रहे हैं। उनकी गलतियों की वजह से हीं यह सवाल वाजिब है कि क्या तेजस्वी यादव हारने के लिए खेलते रहे हैं? यह सवाल इसलिए है कि चाहे वो 2019 का लोकसभा चुनाव हो या फिर 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले की स्थिति परिस्थिति हो तेजस्वी यादव सबसे कारगर रणनीति पर चलने की बजाय उसे दरकिनार करते रहे हैं.

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उनके फैसलों के सियासी परिणाम बेहद बुरे रहे हैं इसलिए महागठबंधन में उनको लेकर नाराजगी बढ़ती रही है और मौजूदा वक्त में जब महागठबंधन को समेटे रखना सबसे जरूरी है तब यह टूट और बिखराव की ओर बढ़ता दिख रहा है। तेजस्वी की गलतियां बताती हैं कि उन्होंने पिता लालू प्रसाद यादव से बहुत सी चीजें नहीं सीखी है।

वक्त पड़ने पर जो लालू अपने सबसे बड़े सियासी दुश्मन नीतीश कुमार के साथ न सिर्फ हाथ मिलाते हैं बल्कि साथ मिलकर 2015 का बिहार विधानसभा चुनाव लड़ते हैं और मौके की नजाकत को देखते हुए कम सीटें होने के बावजूद नीतीश कुमार को सीएम की कुर्सी सौंप देते हैं जबकि तेजस्वी यादव प्रतिकूल परिस्थितियों में भी लालू के इस जरूरी प्रयोग को नहीं अपनाते हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में वे कन्हैया और पप्पू यादव से परहेज करते रहे हैं। आरोप यह भी है कि उन्होनंे गठबंधन धर्म के खिलाफ काम किया। पप्पू यादव से नाराजगी की वजह से उन्होंने महागठबंधन के सहयोगी दल कांग्रेस की प्रत्याशी रंजीता रंजन का प्रचार नहीं किया, राहुल गांधी के साथ मंच साझा नहीं किया इसके साथ हीं कांग्रेस तो खुलकर आरोप लगाती है कि रंजीता रंजन को आरजेडी ने हरवाया?

अब जब आरजेडी के ज्यादातर बड़े नेता जिन्होंने लालू के साथ कई दशक तक राजनीति की है, उनके सियासी चालों को देखा समझा है वे यह मानते हैं कि 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले नीतीश कुमार को महागठबंधन के पाले में लाया जाना चाहिए और यह सबसे मुफीद वक्त है क्योंकि बीजेपी और जेडीयू का झगड़ा लगातार बढ़ रहा है तो दूसरी तरफ तेजस्वी नीतीश कुमार को नो एंट्री का बोर्ड दिखा रहे हैं।

यानि की मौजूदा वक्त में आरजेडी और महागठबध्ंान के लिए जो सबसे कारगर रणनीति है तेजस्वी उसको जानबूझकर नजरअंदाज कर रहे हैं और सियासत में यह बेपरवाही भारी पड़ती है। 2019 का लोकसभा चुनाव उदाहरण है। हालिया कुछ राजनीतिक घटनाक्रमों से यह सवाल खड़ा हुआ है कि क्या तेजस्वी पार्टी के बड़े नेताओं की सलाह भी नहीं सुनते और उनके बयानों और उनकी सलाह को खारिज करते हैं? ताजा उदाहरण है रघुवंश प्रसाद सिंह का वो बयान जिसमें वो कहते हैं कि नीतीश कुमार को महागठबंधन में आना चाहिए और चूंकी बीजेपी उनको फिनिश करना चाहती है इसलिए वे महागठबंधन में आने को तैयार हैं। तेजस्वी इस बयान को खारिज करते हुए कह देते हैं नीतीश कुमार को महागठबंधन में लाने का सवाल हीं नहीं उठता।

तेजस्वी के इन बयानों और उनके कुछ हालिया फैसलों से यह कहा जाना गलत नहीं होगा कि ऐसा लगता है जैसे वो हारने के लिए खेल रहे हों। लालू यादव ने अपनी किताब ‘गोपालगंज टू रायसीना मेरी राजनीतिक यात्रा’ में लिखा है कि अपने राजनीतिक जीवन में मैंने गलती की। मैं अपनी पार्टी के नेताओं की सलाह नहीं सुनता था जिसका नुकसान मुझे उठाना पड़ा? तेजस्वी यादव भी शायद यही कर रहे हैं और इसके नुकसान से आशंकित महागठबंधन के सहयोगी दलों और खुद आरजेडी के नेताओं में छटपटाहट बढ़ रही है।

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