By, Shrikant Pratyush
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दिल्ली के ‘शाहीन बाग़’ जैसा पटना के सब्ज़ीबाग़ में चल रहा है CCA के विरोध में आन्दोलन

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नागरिकता संशोधन कानून को लेकर लगातार धरना प्रदर्शन किये जाने को लेकर जिस तरह से दिल्ली का शाहीन बाग़ इन दिनों चर्चा में है, ठीक उसी तरह पटना का शब्जीबाग़ भी  नागरिकता संशोधन क़ानून और एनआरसी के ख़िलाफ़ हो रहे विरोध प्रदर्शनों के लिए देश भर में चर्चा के केंद्र में आ गया है.

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दिल्ली के ‘शाहीन बाग़’ जैसा पटना के सब्ज़ीबाग़ में चल रहा है CCA के विरोध में आन्दोलन

सिटी पोस्ट लाइव : नागरिकता संशोधन कानून को लेकर लगातार धरना प्रदर्शन किये जाने को लेकर जिस तरह से दिल्ली का शाहीन बाग़ इन दिनों चर्चा में है, ठीक उसी तरह पटना का शब्जीबाग़ भी  नागरिकता संशोधन क़ानून और एनआरसी के ख़िलाफ़ हो रहे विरोध प्रदर्शनों के लिए देश भर में चर्चा के केंद्र में आ गया है. शाहीन बाग़ की ही तरह अब चर्चा में पटना का सब्ज़ीबाग़ भी आ गया है.

शाहीन बाग़ की ही पटना के शब्जीबाग़ में  महिलाएं भी बड़ी संख्या में पुरुषों के साथ दिन-रात बैठकर धरना दे रही हैं. भारी ठंड के बावजूद सैकड़ों महिलाएं यहां 12 जनवरी से सड़क पर बैठी हैं.इसीलिए सब्ज़ीबाग़ को इन दिनों बिहार का शाहीन बाग़ कहा जा रहा है.जिस तरह शाहीन बाग़ के विरोध प्रदर्शन को राजनीतिक हस्तियों, फ़िल्म और साहित्य जगत से जुड़े लोगों और अन्य चर्चित चेहरों का साथ मिल रहा है, उसी तरह पटना के सब्ज़ीबाग़ में चल रहे विरोध प्रदर्शन में कन्हैया कुमार, शिवानंद तिवारी, तेज प्रताप यादव और मशहूर शायर इमरान प्रतापगढ़ी जैसी शख़्सियतें शिरकत कर चुकी हैं. सोशल मीडिया पर भी यहां के विरोध प्रदर्शन की चर्चा है.

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 पटना का सब्ज़ीबाग़ और यहां चला रहा विरोध प्रदर्शन इसलिए भी ख़ास है क्योंकि सब्ज़ीबाग़ के इतिहास में पहली बार मुसलमान महिलाएं घर से निकलकर सड़क पर बैठी हैं. 20वीं शताब्दी की शुरुआत तक जब बांकीपुर पटना डिविज़न का प्रशासनिक केंद्र हुआ करता था, तब तक इस इलाके में सब्ज़ियों का बाज़ार लगा करता था. शायद इसलिए इलाके का नाम भी सब्ज़ीबाग़ पड़ गया.सब्ज़ीबाग़ का इतिहास इससे भी पुराना है क्योंकि यह ऐतिहासिक अशोक राजपथ के किनारे बसा एक मोहल्ला है. अशोक राजपथ वो सड़क है जिसके बारे में कहा जाता है कि यह दुनिया की सबसे पुरानी सड़कों में से एक है.

मेगस्थनीज की किताब ‘इंडिका’ जिसमें मौर्य युग के भारत का वर्णन है, के अनुसार, गंगा के किनारे से गुज़रने वाली यह तब की राजधानी पाटलिपुत्र की वो सड़क थी जिससे होकर सम्राट नदी के घाट पर जाया करते थे. यह हमेशा से पटना की सबसे व्यस्त सड़क रही है.वर्तमान समय में सब्ज़ीबाग़ एक बड़ा और घनी बस्ती वाला मोहल्ला बन गया है. इसके बीच से एक जो सड़क गुज़रती है, उसके एक ओर अशोक राजपथ है और दूसरी तरफ़ बारी पथ. मुस्लिम बहुत इस इलाक़े में अब केवल सब्ज़ी का ही बाज़ार नहीं लगता, बल्कि हर तरह की दुकानें हैं.

सब्ज़ीबाग़ पटना का सांस्कृतिक केंद्र बन गया है. यहां रिहल (वो लकड़ी की तख़्ती जिसपर रखकर धार्मिक ग्रंथ पढ़े जाते हैं) से लेकर लोहबान (धार्मिक कार्यों के दौरान सुगंध पैदा करने के लिए जलाया जाने वाला पदार्थ) तक सबकुछ मिलता है. हर तरह के धार्मिक ग्रंथ यहां की दुकानों पर बिकते हैं. शादी का सारा सामान यहां मिल जाएगा. त्योहारों के दौरान हिन्दू देवी-देवताओं को पहनाए जाने वाले वस्त्र भी यहीं से पूरे शहर में जाते हैं, फिर चाहे वह सरस्वती पूजा हो, छठ पूजा, विश्वकर्मा पूजा या दुर्गा पूजा.इसी सब्ज़ीबाग़ में बीच सड़क पर शामियाना लगाकर 24 घंटे सैकड़ों की संख्या में पुरुष और महिलाएं पिछले हफ़्ते भर से धरने पर बैठे हैं. राष्ट्रीय मीडिया में यह प्रदर्शन सुर्खियां बटोर रहा है.

सब्ज़ीबाग़ में चल रहे विरोध प्रदर्शन का ख़ास पक्ष ये है कि इसमे पुरुषों से अधिक महिलायें शामिल हैं.हर उम्र और हर वर्ग की महिलाएं  हिजाब और  बुरका पहनकर तो कई अपनी गोद में बच्चों को लेकर धरना पर बैठी हैं.यहां आधी सड़क राहगीरों और गाड़ियों के आने-जाने के लिए छोड़ दी गई है और आधे को बांस से घेरकर कुर्सियां लगायी गई हैं. आयोजक और वॉलंटियर्स इस बात को लेकर ख़ासे सचेत दिखते हैं कि सड़क पर आवाजाही न रुके. इसलिए वो घेरे के बाहरी किनारे पर किसी को खड़ा नहीं होने देते हैं.प्रदर्शन स्थल को नारे लिखे प्लैकार्ड, बैनर और पोस्टरों से सजाया गया है जिनमें सीएए को वापस लेने की अपीलें और सरकार विरोधी नारे लिखे हैं.

प्रदर्शन और बाज़ार यहां एकसाथ चल रहे हैं. सभी दुकानें खुली हुई हैं. दुकानों पर ग्राहक भी दिख रहे हैं. पैदल आ-जा रहे लोग प्रदर्शन स्थल से गुजरते हुए ख़ुद ही ठहर जा रहे हैं. वो एक नज़र पूरे दृश्य को निहारते, आगे बढ़ रहे हैं. यहां इस काले कानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हो रहा है. सारी महिलाएं ही बैठी हैं. छोटे-छोटे बच्चे आज़ादी के नारे लगा रहे हैं.

नागरिकता संशोधन अधिनियम और एनसीआर का विरोध कर रही मुस्लिम महिलाओं का कहना है कि यह बेवजह का क़ानून है. जिसकी कोई ज़रूरत ही नहीं थी. इसमें हज़ारों करोड़ रुपये खर्च होंगे. देश में अभी इतनी समस्याएं हैं कि अगर उन पैसों का इस्तेमाल वहां हो तो देश कुछ तरक्की करेगा. ये सरकार जानती है कि तरक्कीमंद देश पर लंबे समय तक राज करना संभव नहीं है, इसलिए देश को लोगों को बांटने का काम कर रही है.

क्या सब्ज़ीबाग़ इससे पहले भी किसी विरोध प्रदर्शन का गवाह रहा है? छोटे-मोटे प्रदर्शन तो हमेशा होते रहते हैं. मगर महिलाएं पहली बार बाहर आई हैं. 1974 के जेपी आंदोलन के समय भी सब्ज़ीबाग़ आंदोलन का अड्डा हुआ करता था. लालू से लेकर नीतीश तक कई बार यहां से प्रोटेस्ट मार्च निकाल चुके हैं. चूंकि यह इलाका पटना यूनिवर्सिटी से एकदम सटा है.”

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