By, Shrikant Pratyush
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कभी भी BJP के खिलाफ मोर्चा खोल सकते हैं नीतीश कुमार

अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया नीतीश कुमार का मंत्रिमंडल विस्तार और जीत पर उनका बयान ...

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कभी भी BJP के खिलाफ मोर्चा खोल सकते हैं नीतीश कुमार

सिटी पोस्ट लाइव : प्रचंड बहुमत के साथ एकबार फिर से मोदी सरकार तो बन गई है लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इसे मोदी की जीत मानने को तैयार नहीं हैं. वो साफ़ कर चुके हैं कि यह जीत किसी एक पार्टी या व्यक्ति की नहीं बल्कि जनता की जीत है. चुनाव से पहले एक भाषा बोलनेवाली बीजेपी और जेडीयू के नेताओं के इस तेवर से तो साफ़ है कि प्रचंड बहुमत के साथ भले मोदी सरकार बन गई है लेकिन नीतीश कुमार बीजेपी या मोदी के दबाव में आनेवाले नहीं हैं. अब वो मोदी मोदी करनेवाले नहीं हैं. अब वो हर फैसला आगामी विधान सभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए ही लेगें.

लोकसभा में 16 सांसद और राज्यसभा में 6 सांसदों की ताकत रखने वाली पार्टी जेडीयू के नेता नीतीश कुमार हैं. फिर भी मोदी मंत्रिमंडल में जिस तरह से उनकी पार्टी को सिर्फ सांकेतिक रुप से एक स्थान देने की कोशिश की गई , नीतीश कुमार सहज महसुश नहीं कर रहे हैं.उन्हें ये बात  इतनी बुरी लगी कि उन्होंने भविष्य में भी मंत्रिमंडल में शामिल होने से इंकार कर दिया.

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दिल्ली से लौटते ही अपने मंत्रिमंडल के विस्तार की घोषणा कर नीतीश कुमार ने हर किसी को चौंका दिया. आज जब विस्तार हुआ तो सिर्फ जेडीयू के ही विधायकों और विधान पार्षदों ने मंत्री पद की शपथ ली. बीजेपी की ओर से कोई नहीं था.  अपने मंत्रिमंडल का यह विस्तार कर नीतीश कुमार ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वे और उनकी पार्टी किसी की अनुकंपा पर नहीं है. बल्कि बिहार में उनकी अपनी ताकत है.

नीतीश कुमार का लक्ष्य अब 2020 का विधानसभा चुनाव है. दिल्ली से लौटने के बाद नीतीश कुमार मीडिया से बात कर रहे थे तो उन्होंने इस बात का भी जिक्र किया कि बिहार में तपती गर्मी में जिन लोगों ने वोट दिया वे पिछड़ा अतिपिछड़ा वर्ग के लोग थे और गरीब गुरबा के इस वर्ग ने बिहार में जीत दिलाने में अपनी बड़ी भूमिका निभाई. लेकिन मोदी मंत्रिमंडल में पिछड़ा, अतिपिछड़ा वर्ग की अनदेखी कर बिहार से जो छह मंत्री बनाए गए उसमें चार तो सवर्ण ही थे. ऐसे में नीतीश कुमार ने अपना जो मंत्रिमंडल विस्तार किया, उसमें अधिकतर पिछड़ा, अतिपिछड़ा और दलित वर्ग को प्रतिनिधित्व देकर यह संदेश दे दिया कि जिस वर्ग की केन्द्र में अनदेखी हुई, उस वर्ग के साथ वे खड़े ही हैं. लेकिन साथ ही ब्राह्मण जाति से संजय झा और भूमिहार जाति से नीरज कुमार को भी मंत्री बनाकर यह भी संदेश दिया कि वे सवर्णों के भी विरोधी नहीं हैं.

मंत्रिमंडल विस्तार के बाद नीतीश कुमार और सुशील मोदी दोनों ने ही एनडीए में किसी तरह के मनमुटाव से इंकार कर भले ही कह दिया कि ऑल इज वेल. लेकिन सुशील मोदी ने यह भी कहा कहा कि मंत्रिमंडल विस्तार में शामिल होने के लिए कहा गया था, लेकिन बीजेपी के केन्द्रीय नेतृत्व ने फिलहाल मना किया. ऐसा नहीं था कि बीजेपी से अगर एक दो मंत्री जाते तो बीजेपी में कोई विद्रोह हो जाता. क्योंकि इस प्रचंड जीत के बाद बीजेपी में कोई चूं भी करे, संभव नहीं दिखता. यानि संदेश साफ है कि दिल्ली में अगर जेडीयू ने मना किया तो पटना में बीजेपी ने मना कर दिया. जाहिर है एनडीए में ऑल इज वेल नहीं है.

इन तमाम प्रकरण में सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि पूरे चुनाव नीतीश कुमार पर हमलावर रही आरजेडी और कांग्रेस की ओर से इतनी बडी राजनीतिक घटना के बाद भी नीतीश कुमार और उनका पार्टी जेडीयू के खिलाफ कोई कटाक्ष नहीं किया. इससे साफ है कि आने वाले दिनों में बिहार में एकबार फिर से नए राजनीतिक समीकरण बन सकते हैं.वैसे भी जीतन राम मांझी आज नीतीश कुमार के करीब इफ्तार पार्टी के बहाने ही सही करीब आ चुके हैं. सों ऑफ़ मल्लाह मुकेश सहनी भी महागठबंधन में असहज महसुश कर रहे हैं, उन्हें साथ लाना नीतीश कुमार के लिए बहुत कठिन काम नहीं है. जहाँ तक कांग्रेस का सवाल है ,उसे तो हमेशा से लालू यादव से ज्यादा पसंद नीतीश कुमार ही रहे हैं. अगर ऐसा कुछ हुआ तो बिहार में अगला मुकाबला बीजेपी का आरजेडी से नहीं बल्कि नीतीश कुमार की जेडीयू के साथ भी हो सकता है. कई ऐसे कारण है और कई ऐसे मुद्दे हैं जिसकी वजह से नीतीश कुमार बीजेपी के साथ असहज महसुश कर रहे हैं. राम मंदिर, जम्मू कश्मीर से 370 हटाने जैसे मुद्दों की वजह से और बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की मांग को लेकर नीतीश कुमार कभी भी मोर्चा खोल सकते हैं.

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