By, Shrikant Pratyush
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यूपी के उस एक्सीडेंटल सीएम की कहानी जो अपने मंत्रियों का नाम भी भूल जाया करते थे

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हिन्दुस्तान ने एक से एक नेताओं को देखा है। सियासत के इतिहास में ऐसे कई नेताओं का नाम दर्ज है जिनसे कई अजीबो-गरीब कहानियां जुड़ी हुई है। देश ने एक्सीडेंटल सीएम भी देखा है और एक्सीडेंटल पीएम भी देखा है।

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यूपी के उस एक्सीडेंटल सीएम की कहानी जो अपने मंत्रियों का नाम भी भूल जाया करते थे

सिटी पोस्ट लाइवः हिन्दुस्तान ने एक से एक नेताओं को देखा है। सियासत के इतिहास में ऐसे कई नेताओं का नाम दर्ज है जिनसे कई अजीबो-गरीब कहानियां जुड़ी हुई है। देश ने एक्सीडेंटल सीएम भी देखा है और एक्सीडेंटल पीएम भी देखा है। इसी हिन्दुस्तान में 13 दिन के मुख्यमंत्री भी हुए हैं और इसी हिन्दुस्तान में 13 दिन के प्रधानमंत्री भी हुए हैं। रातों रात सरकार बनने और गिरने की घटनाएं देश के राजनीतिक इतिहास के पन्नों में दर्ज है। सियासत की इन्हीं बेशुमार कहानियांे में से एक कहानी हम ढूंढ लाये हैं यूपी के उस मुख्यमंत्री की जिसे भुलक्कड़ सीएम कहा गया। देश के सबसे बड़े राज्य का वो मुख्यमंत्री जिसे एक्सीडेंटल सीएम भी कहा जाता है। कहानी शुरू करते हैं यूपी के 18वें मुख्यमंत्री रामप्रकाश गुप्ता की।

रामप्रकाश गुप्ता का जन्म 26 अक्टूबर 1924 को झांसी के सुकवा-ढुंकवा में हुआ था। बद में बुलंद शहर के सिंकदराबाद में वे रहने लगे। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से गोल्ड मेडलिस्ट बने। कालेज के समय से हीं रामप्रकाश गुप्ता राजनीति से जुड़ गये। तकदीर की लकीरों में मुख्यमंत्री जो बनना था वो भी पूरे 351 दिनों के लिए। अब चलते हैं साल 1999 में जब यूपी को एक एक्सीडेंटल सीएम मिलना था। गुमनामी की अंधेरे से निकलकर राज्य सत्ता की सबसे उंची कुर्सी पर इसी साल बैठे थे रामप्रकाश गुप्त।

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भाजपा अपनी राजनीति से परेशान थी। जैसा की अक्सर होता है एक अनार सौ बीमार वाली स्थिति थी। सीएम की कुर्सी एक थी दावेदार कई थी। कहा तो जाता है कि तब बीजेपी का हर नेता मुख्यमंत्री बनना चाहता था। फिर 12 नवंबर 1999 को रामप्रकाश गुप्ता को गद्दी पर बैठा दिया गया। एक साल से भी कम राज्य के मुख्यमंत्री रहे राम प्रकाश जी काफी भुलक्कड़ भी थे। उन पर पार्टी नेताओं ने भुलक्कड़ शैली और अकर्मण्यता के आरोप लगाए। इस दौरान उनके कई किस्से भी मशहूर हो गए कि किस तरह से वे अपने ही मंत्रिमंडल के सदस्यों के नाम भूल जाया करते थे। यही नहीं स्पीच के दौरान बोलना कुछ और था, वो कह कुछ और जाते थे। बहरहाल, पार्टी में उनके प्रति बढ़ते असंतोष और आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए भाजपा ने एक बार फिर नेतृत्व परिवर्तन का फैसला किया। राज्य की सत्ता संभालने के एक साल के भीतर ही पार्टी आलाकमान ने गुप्ता को इस्तीफा देने का आदेश दिया और 28 अक्टूबर 1999 को राजनाथ सिंह ने कुर्सी संभाल ली।

रामप्रकाश गुप्ता का जनसंघ से भी नाता रहा। वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी रहे। 1948 में वे जनसंघ से जुड़े और आठ साल बाद जनसंघ के संगठन मंत्री बना दिये गये थे। 1964 में यूपी विधान परिषद सदस्य चुने गये यानि की एमएलसी। 1967 में चैधरी चरण सिंह की सरकार में मंत्री भी रहे। यूपी के डिप्टी सीएम भी रहे। 1975 में इमरजेंसी के खिलाफ यूपी में सत्याग्रह हुआ। जून 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर विधानसभा पहुंचे। इसी साल रामनरेश यादव की सरकार में मंत्री भी बने।

एक दौरवो भी आया जब वे गुमनामी के अंधेरे में खो गये। इनका कद घटने लगा। कहते हैं इनको कोई पूछने वाला नहीं था लेकिन फिर 12 नवंबर 1999 की वो तारीख भी आयी जब गुमनामी का अंधेरा छंटा, संयोगो ने साथ दिया और देश के सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री बन गये। फिर याद दिला देता हूं पूरे 351 दिन के लिए। साल में 365 दिन होते हैं तो समझ लिए एक साल से थोड़े कम वक्त के लिए यूपी के 18वें मुख्यमंत्री बने थे रामप्रकाश गुप्त।

(इस आलेख में दिये गये तथ्य अलग-अलग मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित हैं)

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