By, Shrikant Pratyush
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लालू की किताब में लालकृष्ण आडवाणी की इतनी तारीफ क्यों है?

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लालू यादव की किताब ‘गोपालगंज टू रायसीना मेरी राजनीतिक यात्रा’ अगर छपकर बाजार में न आयी होती तो यह यकीन करना नामुमकिन हीं था कि लालू बीजेपी के बड़े नेता लालकृष्ण आडवाणी की तारीफ भी कर सकते हैं वो भी इतनी तारीफ की यकीन को भी यकीन न हो कि लालू ने जो लिखा है वो आडवाणी के लिए लिखा है।

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लालू की किताब में लालकृष्ण आडवाणी की इतनी तारीफ क्यों है?

सिटी पोस्ट लाइवः लालू यादव की किताब ‘गोपालगंज टू रायसीना मेरी राजनीतिक यात्रा’ अगर छपकर बाजार में न आयी होती तो यह यकीन करना नामुमकिन हीं था कि लालू बीजेपी के बड़े नेता लालकृष्ण आडवाणी की तारीफ भी कर सकते हैं वो भी इतनी तारीफ की यकीन को भी यकीन न हो कि लालू ने जो लिखा है वो आडवाणी के लिए लिखा है। भला कौन क्यों और कितना यकीन किया जा सकता था इस बात में कि लालू का पूरा परिवार जिन मुश्किलों में घिरा है उसके लिए बीजेपी को जिम्मेवार बताया जाता है।

लालू जिस बीजेपी के घोर विरोधी हैं, कट्टर राजनीतिक दुश्मन हैं उस बीजेपी के कद्दावर नेता बीजेपी की तारीफ कर सकते हैं। किताब को लिखने में कितनी ईमानदारी बरती गयी है यह अलग विषय है लेकिन किताब में लालू की साफगोई से भी परिचय होता है तभी तो उन्होंने बीजेपी के लिए तमाम बातें लिखी है लेकिन उसके सबसे बड़े नेता लाल कृष्ण आडवाणी की तारीफ की है। दरअसल मामला आडवाणी की गिरफ्तारी से जुड़ा है। बिहार में लालू द्वारा आडवाणी का रथ रोके जाने और उनकी गिरफ्तारी का किस्सा खूब मशहूर है लेकिन इस किस्से को ज्यादातर लोगों ने आधा अधूरा हीं सुना और समझा है।

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बिहार में आडवाणी की गिरफ्तारी वाला सिक्के का एक पहलू यह भी है कि लालू और आडवाणी दोनों ने तब बड़प्पन का परिचय दिया था। लालू ने आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद कम से कम सख्ती बरतने की कोशिश की थी और आडवाणी ने अपनी गिरफ्तारी के बाद लालू के लिए कोई मुश्किल खड़ी नहीं की। किस्सा कुछ यूं है कि 1990 में बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी सोमनाथ से अपनी रामरथ यात्रा लेकर चले थे। इस रथ यात्रा को बिहार से होते हुए यूपी के अयोध्या पहुंचना था। लालू पहले हीं आडवाणी से मिलकर उन्हें चैलेंज दे चुके थे कि आपको बिहार में नहीं आने देंगे लेकिन चैलेंज वाला किस्सा बाद में फिलहाल उस कहानी पर लौटते हैं जिसका जिक्र पहले किया था।

तो आडवाणी बिहार से होकर अपनी राम रथ यात्रा को अयोध्या ले जाना चाहते थे लेकिन लालू को यह किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं था। लालू ने अपनी किताब में लिखा है कि वे आडवाणी को गिरफ्तार करना चाहते थे लेकिन राज्य के अधिकारी हीं उनका साथ नहीं दे रहे थे। उनका तर्क था कि अगर आडवाणी को गिरफ्तार किया गया तो कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है। लालू में अंत में दो अधिकारियों को आडवाणी को गिरफ्तार करने की जिम्मेवारी सौंपी। आरके सिंह और रामेश्वर उरांव। आरके सिंह अभी आरा से बीजेपी को सांसद हैं। आडवाणी समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिये गये। गिरफ्तारी के बाद लालकृष्ण आडवाणी को दुमका के मसानजोर गेस्ट हाउस ले जाया गया। आडवाणी को इस गेस्ट हाउस में नजरबंद करके रखा गया था।

दरअसल लालू द्वारा आडवाणी की तारीफ वाला किस्सा यहीं से शुरू होता है। लालू ने अपनी किताब में लिखा है-‘ मैं यह जरूर कहूंगा कि नजरबंद रहते हुए आडवाणी ने संतुलन और भद्रता का परिचय दिया। अपनी बात पर अड़े रहने वाले इस व्यक्ति की अपनी छवि थी। यह खबर किसी तरह लीक हो गयी कि नजरबंद आडवाणी दिन में दो बार अपनी पत्नी से बात करते हैं। एक वरिष्ठ पत्रकार ने आडवाणी की पत्नी कमला आडवाणी से अनुरोध किया कि जब वह आडवाणी से बात कर रहे हों तब वह उनका इंटरव्यू लेना चाहती हैं। एक नियत समय पर जब पति-पत्नी हाॅट लाइन पर बात कर रहे थे तब पत्रकार ने दूसरे छोर से आडवाणी से बात करने की कोशिश की। आडवाणी ने उनसे बातचीत करने से मना कर दिया क्योंकि यह उस वायदे के खिलाफ होता जो उन्होंने मुझसे किया था कि वे सिर्फ अपनी पत्नी से बात करेंगे। हांलाकि बाद में उस पत्रकार ने यह खबर फैला दी कि उन्होंने आडवाणी से बातचीत की है।

बाद में आडवाणी ने सच्चाई सबसे कही और यह बयान दिया कि उन्होंने किसी पत्रकार से कोई बातचीत नहीं की है। आडवाणी चाहते तो चुप रह सकते थे लेकिन सच कहकर उन्होंने अपने बड़प्पन का परिचय दिया और एक होनहार अधिकारी का करियर बचा लिया।’ 1990 में आडवाणी की राम रथ यात्रा के दौरान बिहार में उनकी गिरफ्तारी और उसके बाद का यह पूरा प्रसंग बेहद दिलचस्प है और यही वजह है कि यह किताब पढ़ने की जिज्ञासा पैदा करती है। इस किताब में बहुत कुछ ऐसा है जिसे आपने बहुतों बार सुना है लेकिन बहुत कुछ ऐसा भी जो अनसुना है। लालू की किताब से ऐसे अनसुने और अनकही कहानियों को निकालकर आपके सामने परोसते रहेंगे।

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