By, Shrikant Pratyush
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फीफा विश्व कप : संक्षिप्त इतिहास

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हालांकि 1942 और 1946 में, द्वितीय विश्व युद्ध के कारण इसका आयोजन नहीं किया जा सका।साल 1928 में ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतने वाले उरुग्वे ने इसकी मेजबानी की थी, इसमें 13 टीमें शामिल हुई थीं, जिनमें दक्षिण अमेरिका के 7 देश, यूरोप के 4 देश और उत्तरी अमेरिका के 2 देशों की टीमें थीं।

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सिटी पोस्ट लाइव, स्पोर्ट्स डेस्क : फीफा (फेडरेशन इंटरनेशनेल डी फुटबॉल एसोसिएशन) वर्ल्ड कप – विभिन्न देशों की राष्ट्रीय टीमों द्वारा खेली जाने वाली अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल प्रतियोगिता – की शुरुआत 13 जुलाई 1930 को हुई थी। है।1930 में हुए उद्घाटन टूर्नामेंट के बाद हर चार साल बाद  इसका आयोजन होता आया है। हालांकि 1942 और 1946 में, द्वितीय विश्व युद्ध के कारण इसका आयोजन नहीं किया जा सका।साल 1928 में ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतने वाले उरुग्वे ने इसकी मेजबानी की थी, इसमें 13 टीमें शामिल हुई थीं, जिनमें दक्षिण अमेरिका के 7 देश, यूरोप के 4 देश और उत्तरी अमेरिका के 2 देशों की टीमें थीं।

प्रथम फीफा वर्ल्ड कप में कुल 18 मैच खेले गए थे। पहला मैच फ्रांस और मैक्स‍िको के बीच खेला गया। उरुग्वे ने अर्जेंटीना को फाइनल में 4-2 से हराया था. टूर्नामेंट में 8 गोल करने वाले अर्जेंटीना के गिलर्मो स्टैबाइल सबसे आगे रहे।फीफा वर्ल्ड कप के इतिहास में सबसे ज्यादा 5 बार चैंपियन का ताज ब्राजील की टीम के सिर कायम है, जबकि 2014 के चैंपियन जर्मनी ने 4 बार इस खिताब को अपने नाम किया। इटली भी 4 बार खिताब जीतने में सफल रहा है। ब्राजील ने अपने सभी खिताब विदेशी सरजमीं पर जीते. ब्राजील इकलौती ऐसी टीम है, जिसने अब तक सभी वर्ल्ड कप संस्करणों में भाग लिया।  ब्राजील के ‘पेले’ ऐसे फुटबॉलर हैं, जिनकी मौजूदगी में – फुटबाल को अपने पांवों के वश में करने, रखने, नचाने और उसे प्रतिद्वन्द्वी टीम के गोलपोस्ट के अंदर निहायत सलीके से पहुंचाने की उनकी जादूगरी से – ब्राजील ने 1958, 1962 और 1970 में वर्ल्ड कप का खिताब अपने नाम किया।

फीफा में औरत

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क्या फुटबाल सिर्फ पुरुषों का खेल है? फ़ीफा-2018 में ‘औरत’ का भी फुटबाल की मानिंद एक वस्तु के रूप में इस्तेमाल किये जाने की छूट क्यों मिली हुई है?फीफा विश्व कप पूरे शबाब पर है। अगल-अलग टीमों ने अपने खिलाड़ियों के लिए खेल और अनुशासन के संदर्भ में कई तरह के नियम बनाए हैं, जो काफी हद तक एक जैसे हैं। लेकिन एक विषय में हर टीम के लिए अलग-अलग नियम हैं। वह है – औरत। फीफा-2018 के आयोजन में अलग-अलग देशों ने अपने-अपने खिलाड़ियों के लिए ‘सेक्स संबंधी उपभोग – शारीरिक यौन संबंध के नियम बनाए हैं।

बानगी :

कोस्टारिका के खिलाड़ी दूसरे दौर से पहले अपनी पत्नियों, प्रेमिकाओं या अन्य किसी के साथ हमबिस्तर नहीं हो सकते। उनके लिए सेक्स दूसरे दौर में पहुंचने का पुरस्कार है। ब्राजील के खिलाड़ियों को दूसरे दौर से पहले शारीरिक संबंध बनाने की छूट है। लेकिन उनसे कहा गया है कि वे शारीरिक क्षति को लेकर सावधान रहें। नाइजीरिया के खिलाड़ियों को विश्व कप के दौरान सिर्फ अपनी पत्नी के साथ शीरीरिक संबंध बनाने की छूट दी गयी है। यानी वे विश्व कप के दौरान सिर्फ अपनी पत्नियों के साथ हमबिस्तर हो सकते हैं, प्रेमिकाओं के साथ नहीं। रूस, मेक्सिको, बोस्निया व हर्जेगोविना ने अपने खिलाड़ियों पर विश्व कप के दौरान सेक्स पर लगभग पूर्ण प्रतिबंध लगा रखा है।

फ्रांसीसी खिलाड़ियों के लिए सेक्स पर पाबंदी नहीं, लेकिन उसके खिलाड़ी पूरी रात इसमें मशगूल नहीं रह सकते। टीम के डॉक्टर कहते हैं – “सेक्स खिलाड़ियों के लिए अच्छा है, लेकिन इसमें रात-भर लगे रहना नुकसानदायक है।” विश्व कप में हिस्सा ले रहे विभिन्न देशों के खिलाड़ियों के कोचों में से कुछ की मान्यता है कि खिलाड़ी सेक्स से अधिक थक जाएंगे। इसलिए उन्होंने अपने स्तर पर खिलाड़ियों को इस थकान से बचाने के लिए नए नियम बनाए हैं। इसके मुताबिक जर्मनी, स्पेन, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, इटली, नीदरलैंड्स, स्विट्जरलैंड, उरुग्वे और इंग्लैंड ने खिलाड़ियों पर सेक्स को लेकर कोई खास तरह का प्रतिबंध या पाबंदी नहीं लगाई है। सिर्फ कुछ चेतावानियाँ और अनुशासन की हिदायतें आयद की हैं।

कुछ देशों के कोचों का मानना है कि अगर खिलाड़ी मैदान में अपनी क्षमता के साथ न्याय कर रहे हैं, तो फिर उन्हें सेक्स की स्वाभाविक क्रिया से रोका नहीं जाना चाहिए।मेक्सिको के कोच मिग्वेल हेरेरा का कहना है कि 40 दिनों तक शारीरिक सम्बंध नहीं बनाने से दुनिया उलट-पुलट नहीं जाएगी। अगर एक खिलाड़ी एक महीने या फिर 20 दिनों तक शारीरिक सम्बंध बनाए बिना नहीं रह सकता, तो वह पेशेवर कहलाने के लायक नहीं।रूस, चिली, मेक्सिको और बोस्नियाई टीमों ने हालांकि सेक्स पर पूरी तरह रोक लगा रखा है। लेकिन इन टीमों के कोचों का मानना है कि उनके खिलाड़ी अपनी सेक्स से जुड़ा सारा ‘फ्रस्टेशन’ मैदान में उतारें, क्योंकि वे इसी काम के लिए यहां आए हैं।

फीफा और भारत

भारत आज तक फीफा वर्ल्ड कप में नहीं खेल पाया है, जबकि 1950 में ब्राजील में हुए फीफा वर्ल्डकप में भारतीय टीम ने क्वालिफाई कर लिया था। इसके बावजूद यानी 1950 फीफा वर्ल्ड कप में क्वालिफाई करने के बावजूद भारत अपना नाम वापस लेने को मजबूर हुआ।क्यों? इसलिए कि तब भारतीय खिलाड़ी बिना जूतों के नंगे पैर फुटबॉल खेलते थे, और  टूर्नामेंट में नंगे पैर खेलने की इजाजत नहीं थी। इस वजह से भारत ने नाम वापस ले लिया।

भारतीय फुटबॉल के कुछ जानकार और पूर्व फुटबॉल खिलाड़ियों का मानना है कि उस समय इतने पैसे नहीं थे कि भारत अपने खिलाड़ियों को ब्राजील भेज पाता। लेकिन आज जूतों से लैस होने के बावजूद भारतीय पांवों में वह कौशल नहीं आया, जिससे भारत फीफा विश्व कप-2018 के मुकाबलों में शामिल होने का दावा कर सके। विश्व फुटबाल की रैंकिंग में भारत 97वें स्थान पर है।

1950 और 1960 के दशक में भारतीय टीम एशिया में नंबर वन टीम रही और 1954 के एशियाई खेलों में भारत फुटबॉल में दूसरे स्थान पर रहा। 1956 ओलंपिक में भारतीय फुटबॉल टीम ने सेमीफाइनल तक का सफर तय किया था, लेकिन 60 के दशक के बाद से भारत की फुटबॉल टीम पिछड़ गई।

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