By, Shrikant Pratyush
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पटना के एक चपरासी की बिटिया बन गई है जज बिटिया, दिलचस्प है कहानी.

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मूल रूप से पटना के धनरूआ थाना अंतर्गत मानिक बिगहा गांव की अर्चना अपने गांव में ‘जज बिटिया’ के नाम से मशहूर हो रही हैं.चार भाई-बहन में सबसे बड़ी अर्चना के लिए लेकिन उनका ये सफ़र जिंदगी के बहुत घुमावदार रास्तों से गुज़रा. बचपन में ही अस्थमा की बीमारी के चलते वो बहुत बीमार रहती थीं और घर में ग़रीबी का डेरा था.लेकिन इस बिटिया ने हार नहीं मानी.अपनी मेहनत और प्रतिभा के बल पर वह जज बनने में सफल हो गई.

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पटना के एक चपरासी की बिटिया बन गई है जज बिटिया, दिलचस्प है कहानी.

सिटी पोस्ट लाइव ; एक चपरासी की बिटिया ने ऐसा कारनामा कर दिखाया है,जिसे देख लोग दाँतों तले उंगुली दबा ले रहे हैं.एक चपरासी की बेटी अर्चना कुमारी ने 2018 में हुई 30वीं बिहार न्यायिक सेवक परीक्षा में सफलता हासिल कर ये साबित कर दिया है कि प्रतिभा किसी की मुंहताज नहीं होती.अर्चन अपने परिवार के साथ  एक कमरे के सर्वेंट क्वॉर्टर में रहती थी.उसके दिन भर जज साहब के पास खड़े रहते थे. फिर क्या था एक कमरे बस वही कोठी, जज को मिलने वाला सम्मान और मेके घर में रहनेवाली इस बेटी ने जज बनने की ठान ली और बनकर दिखा भी दिया.

34 साल की अर्चना के पिता सोनपुर रेलवे कोर्ट में चपरासी के पद पर थे. और अब उनकी बिटिया अर्चना कुमारी ने 2018 में हुई 30वीं बिहार न्यायिक सेवक परीक्षा में सफलता हासिल की है.बीते नवंबर के आख़िरी हफ़्ते में घोषित नतीजों में अर्चना को सामान्य श्रेणी में 227वां और ओबीसी कैटेगरी में 10वीं रैंक मिली है. बेहद साधारण परिवार से निकलकर बड़ी उपलब्धि हासिल करने वाली अर्चना को अपनी उपलब्धि पर तो गर्व जरुर है लेकिन उसकी  विनम्रता ख़त्म नहीं हुई है.

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मूल रूप से पटना के धनरूआ थाना अंतर्गत मानिक बिगहा गांव की अर्चना अपने गांव में ‘जज बिटिया’ के नाम से मशहूर हो रही हैं.चार भाई-बहन में सबसे बड़ी अर्चना के लिए लेकिन उनका ये सफ़र जिंदगी के बहुत घुमावदार रास्तों से गुज़रा. बचपन में ही अस्थमा की बीमारी के चलते वो बहुत बीमार रहती थीं और घर में ग़रीबी का डेरा था.पटना के राजकीय कन्या उच्च विद्यालय, शास्त्रीनगर से बारहवीं पास अर्चना ने पटना यूनिवर्सिटी से साइकोलॉजी ऑनर्स किया है.लेकिन इसी बीच ग्रैजुएशन की पढ़ाई करते समय साल 2005 में उनके पिता गौरीनंदन प्रसाद की असामयिक मृत्यु हो गई.

अर्चना बताती हैं, “बहुत मुश्किल था क्योंकि सबसे बड़ी होने के नाते भाई-बहनों की ज़िम्मेदारी थी. चूंकि मैने कंप्यूटर सीखा था तो मैंने अपने ही स्कूल में कंप्यूटर सिखाना शुरू किया ताकि घर ख़र्च में मदद की जा सके. तीन बहनें थीं तो घरवालों पर शादी का बहुत दबाव था. 21 साल की उम्र में मेरी शादी कर दी गई और मैंने भी ख़ुद को समझा लिया कि मेरी पढ़ाई का अंत अब हो गया.”

लेकिन छह साल की उम्र से ही जज बनने का सपना देख रही अर्चना ख़ुशकिस्मत निकलीं.उनके पति राजीव रंजन ने उन्हें उनके सपनों को पूरा करने में मदद की. 2006 में अर्चना की शादी हुई थी.पति ने उनमें पढ़ने की ललक दिखी तो साल 2008 में पुणे विश्वविद्यालय में अर्चना ने एलएलबी कोर्स में दाखिला ले लिया.अर्चना बताती है, “मेरी पूरी पढ़ाई हिंदी माध्यम से थी, इसलिए रिश्तेदारों ने कहा कि मैं जल्द ही पुणे यूनिवर्सिटी के अंग्रेज़ी माहौल से भाग आऊंगी. वो बार-बार कहते थे कि मेरे पति गोइठा में घी सुखा रहे हैं. मेरे सामने अंग्रेज़ी में तो पढ़ाई करने की चुनौती तो थी ही, और बिहार से पहली बार बाहर निकली थी.

2011 में क़ानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद वो पटना वापस आईं तो गर्भवती हो गईं.साल 2012 में उन्होंने एक बच्चे को जन्म दिया. बच्चे की पैदाइश के बाद की ज़िम्मेदारी बड़ी थी. लेकिन अर्चना ने अपने सपनों और मां की ज़िम्मेदारी का संतुलन साधा.वो अपने 5 माह के बच्चे और अपनी मां के साथ आगे की पढ़ाई और तैयारी के लिए दिल्ली चली गईं.यहां उन्होंने एलएलएम की पढ़ाई, प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी की और साथ ही अपनी आजीविका के लिए कोचिंग में क़ानून के छात्रों को पढ़ाया भी.

अर्चना के पति राजीव रंजन पटना के पटना मेडिकल कॉलेज के एनाटॉमी विभाग में क्लर्क हैं.वो अपनी पत्नी की सफलता से बेहद खुश हैं.उनका कहना है कि अर्चना में पढ़ने की बहुत ललक है. उन्होंने उसे पढ़ाया जिसका नतीजा सबके सामने  है. उन्होंने कहा कि हर मां-बाप और पति को अपनी पत्नी को पढने लिखने का मौका देना चाहिए.

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