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बिहार BJP में जारी है घमाशान, क्या करेगें नीतीश कुमार?

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सिटी पोस्देट लाइव : लोकसभा चुनाव के बाद  बीजेपी में समीक्षा और बयानबाजी का दौर शुरू है. प्रधानमंत्री मोदी को शपथ लिए अभी एक महीने भी नहीं हुए है और भाजपा के अंदर यूपी और बिहार में खराब प्रदर्शन के कारण नेताओं में घमासान शुरू हो गई है. अश्विनी कुमार चौबे ने कहा कि अब भाजपा को आयातित नेता नहीं चाहिए यानी उनका सीधा निशाना सम्राट चौधरी पर था. खबरें तो ये भी है कि सम्राट चौधरी समीक्षा बैठक के बीच में से ही उठ कर चले गए. इसके अलावा अश्विनी कुमार चौबे ने एक और बयान दिया कि भाजपा को खुद अपने नेतृत्व में अगला 2025 का विधानसभा चुनाव लड़ना चाहिए. समीक्षा बैठक में भाजपा के तीन हारे हुए प्रत्याशी और पूर्व सांसद वहां नहीं पहुंचे. यानी जो भी, पर बिहार भाजपा में सब कुछ ठीक नहीं है.

 

ऊपर से तो देखने में बिहार का चुनावी समीकरण ठीक लगता है, लेकिन अश्विनी चौबे के बयान के बाद और भी बयान सामने आ रहे हैं. बीजेपी के काफी बुद्धिजीवी नेता में से एक संजय पासवान का कहना है कि अगर नीतीश कुमार नहीं होते तो भाजपा जीरो सीट पर आउट हो जाती. यानी, अब नीतीश के लिए भाजपा के नेता एक-दूसरे का ही प्रतिरोध कर रहे हैं. अश्विनी कुमार चौबे की भाजपा को लेकर हो रही चिन्ताएं बिलकुल बेवाजिब नहीं है. अश्विनी चौबे का ये कहना है कि भाजपा को अब अपने अकेले दम पर बिहार में सरकार बनानी चाहिए. खुद के दम पर सरकार बनाने की डिमांड बिहार भाजपा की बहुत पहले से रही है और नीतीश कुमार भाजपा के बड़े भाई बन के ही हमेशा रहें, ये बात भाजपा के स्थानीय नेतृत्व को बहुत पसंद नहीं है.

 

अगर देखा जाए तो भाजपा के गठबंधन से लोकसभा चुनाव में सबसे अधिक फायदा नीतीश कुमार को हुआ है क्योंकि बिहार की 16 में से 12 सीटों पर जदयू  जीत चुका है. नीतीश कुमार की दिल्ली में होने वाली राष्ट्रीय कार्यकारणी की बैठक में वो इस बात पर अधिक ध्यान देंगे कि लोकसभा चुनाव के तरह ही होने वाले विधानसभा चुनाव में भी इसी प्रकार वोटरों को एकजुट कैसे रखें? फिर नीतीश कुमार उसी आधार पर विधानसभा चुनाव को लड़ने की तैयारी करेंगे. इसी कारण ये बीजेपी के लिए एक चिंता का विषय है. शुरू से ही एक असमंजस जैसी स्थिति बनी हुई है, क्योंकि बिहार में भाजपा को अपने दम पर सत्ता पाने की राह में सबसे बड़ा खतरा उनके सहयोगी खुद नीतीश कुमार है. ऐसा कहा जा रहा है कि इस बार बीजेपी और जदयू का जो गठबंधन हुआ था वो मजबूरी का गठबंधन था .

 

राजद और जदयू की सरकार रहते हुए नीतीश कुमार ने जो फैसले लिए थे उसमें खासकर जातीय जनगणना और आरक्षण के सीमा को बढ़ाने वाला, इससे बिहार भाजपा कहीं न कहीं भयभीत थी. हालांकि, इसका उल्टा हो गया और बिहार की जगह भाजपा को उत्तर प्रदेश में अन्य कारणों के वजह से अधिक नुकसान हुआ . बिहार में भाजपा को जितने नुकसान की अपेक्षा थी, उतना नहीं हुआ. शुरुआत में भाजपा को ये लग रहा था कि आरक्षण की सीमा को बढ़ाने वाला नीतीश कुमार का मास्टर स्ट्रोक था.इसी डर की वजह से भाजपा ने जदयू के साथ गठबंधन किया और इस गठबंधन का सर्वाधिक फायदा नीतीश कुमार ले गए.

 

इस समय भाजपा की जो स्थिति है  इससे अश्विनी कुमार चौबे और संजय पासवान हों या बीजेपी के बाकी स्थानीय नेता हो उनको डर लग रहा है कि क्या भाजपा फिर से 2005 वाली स्थिति में जा रही है और एक बार फिर नीतीश कुमार उनसे मजबूत बन के आ जाएंगे? भाजपा के लोगों को उनका पिछलग्गू बनकर घूमना पड़ेगा. भारत के अन्य प्रदेशों जैसे उड़ीसा और तेलंगाना में भाजपा की सरकार आ रही है, दक्षिण में उसकी उपस्थिति बढ़ी है, जिससे भाजपा का दक्षिण भारत में प्रदर्शन सुधर रहा है. इससे ये स्पष्ट हो जाता है कि भाजपा को बिहार के लिए भी चिंता करनी चाहिए. यही चिंता अब भाजपा में अनबन की स्थिति तक ला दे रही है.

 

बिहार भाजपा में ये बहुत पहले से कहा जा रहा है कि बिहार में जितने नेता है उतने उनके खेमे हैं. भाजपा के सम्राट चौधरी बाहर से घूमकर के आये हैं. बीजेपी के पहले वो कई दल के रह चुके हैं. कुछ नेता पुराने हैं जो कैडर वाले है और जाति के आधार पर भी खेमे में बने हुए है. बिहार में बीजेपी इसलिए बार-बार फंस जाती है कि बिहार के चुनाव में जो जाति का समीकरण है और जो जाति की राजनीति है, इसका इस्तेमाल उत्तर प्रदेश या बाकी अन्य राज्यों की तुलना में बिहार में काफी मजबूती से किया जाता है. इसी वजह से बीजेपी बिहार में बार-बार फंसान हो जाती है. इससे पहले बीजेपी ने मंगल पांडेय, नन्द किशोर यादव, नित्यानंद राय, संजय जायसवाल और सम्राट चौधरी इन सब को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर सभी जातीय समीकरणों को साधने की कोशिश की है.

 

हिंदुत्व के नाम पर बाकी राज्यों में भाजपा को वोट पड़ता है वो तरीका बिहार में काम नहीं करता है. बीजेपी के साथ उपेंद्र कुशवाहा थे, लेकिन कुशवाहा जाति के वोटों को साधने के लिए भाजपा ने एक और कुशवाहा सम्राट चौधरी को न केवल प्रदेशाध्यक्ष बनाया, बल्कि डिप्टी सीएम बना दिया. अब आरजेडी ने अपने सर्वाधिक कैंडिडेट  कुशवाहा जाति के लोगों को बना दिया. भाजपा ने जैसा उम्मीद की थी, वह एक ही जाति के कैंडिडेट के क्लेश की वजह से वैसा का वैसा नहीं मिल पाया. बीजेपी को अपनी पुरानी आइडोलॅाजी पर रहना चाहिए, जिस प्रकार से पहले भाजपा हिंदू युनिटी और सनातन की बात करती है तो भाजपा को उसी पर टिके रहने से फायदा होगा. इसका फायदा बीजेपी को पहले के दो लोकसभा चुनावों में होता रहा है.

 

पहले नीतीश कुमार की दिल्ली की बैठक में सिर्फ पदाधिकारियों के साथ मिलने वाले थे पर उसका दायरा बढ़ा दिया गया.उन्होंने  राष्ट्रीय कार्यकारिणी के लोगों के साथ भी मीटिंग की. नीतीश कुमार के भाजपा से अब आगे कब तक संबंध बने रहेंगे तो इसका जवाब हमें 2025 के विधानसभा के चुनाव के 4- 5 महीने पहले मिलेगा. नीतीश कुमार को भी अब सब को शॉक-ट्रीटमेंट देने की आदत पड़ चुकी है. वो पहले भी सब को अचानक अपने फैसले से चौंका चुके हैं. फिलहाल नीतीश कुमार नयी पीढ़ी को आगे लाना चाहते हैं. अब उनका उत्तराधिकारी कौन बनेगा, ये एक बड़ा सवाल है? हाल में ये चर्चा चल रही थी कि नीतीश कुमार अपने बेटे को राजनीति में लाने वाले हैं.

 

लोकसभा चुनाव के बाद खुद नीतीश कुमार को ये भरोसा नहीं हो पा रहा है कि वो 16 में से 12 सीटें कैसे जीत गए. हालांकि, नीतीश कुमार ने बिहार में नौकरी, आरक्षण और जातिगत सर्वेक्षण को लेकर जो नीतियां अपनायीं थीं, वो काम आयीं, टीचर्स और नर्सेस की बहाली के लिए जो किया था, उन महिलाओं ने नीतीश के लिए ईमानदारी दिखाई है. इसके लिए नीतीश कुमार को अपने महिला वोटर के लिए थैंकफुल होना चाहिए. अब नीतीश कुमार को इस तरह का वोटिंग पैटर्न बहुत अच्छे से समझ आ गया है और इस पैटर्न को वह आने वाले विधानसभा के चुनाव में इस्तेमाल करना चाहेंगे. तभी नीतीश कुमार भाजपा के बड़े भाई बने रह पायेंगे, नहीं तो जिस प्रकार अभी बिहार भाजपा में स्वर उठने लगे हैं कि अब भाजपा को अकेले दम पर आना चाहिये, ये आवाज आगे चलकर और तेज होगी. इसी वजह से हो सकता है कि विजय सिन्हा और सम्राट चौधरी कह दें कि नीतीश कुमार के नीचे चुनाव नहीं लड़ेंगे, भले ही उन्होंने शुरुआती दौर में इस पर सहमति जतायी है.

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