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PM फेस बनने को क्यों तैयार नहीं हैं CM नीतीश कुमार ?

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सिटी पोस्ट लाइव : विपक्षी दलों को एकजुट करने में जुटे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बार बार ये सफाई दे रहे हैं कि उनकी PM बनने की कोई महत्वकांक्षा नहीं है.वो खुद पीएम फेस बनने से इनकार करते रहे हैं. आरजेडी और उनकी पार्टी जेडीयू लगातार नीतीश को पीएम मटेरियल बता रही है लेकिन नीतीश अपनी एक ही रट पर अड़े हैं- उन्हें पीएम नहीं बनना. अघोषित तौर पर उनकी भूमिका महज कोआर्डिनेटर की दिख रही है. अभी तक तो वे घर-घर जाकर विपक्षी नेताओं से मुलाकात करते रहे हैं, लेकिन बंगाल की सीएम ममता बनर्जी की सलाह पर वे पटना में विपक्षी दलों की बैठक बुलाने के लिए तैयार हो गए हैं.

 

दरअसल, नीतीश कुमार कोशिश तो कर रहे, लेकिन उन्हें विपक्ष के एक होने का भरोसा नहीं हो पा रहा है. नीतीश को तो अभी तक एक साथ सबके जुटने पर भी संदेह है. तभी तो वे बार-बार यह बात कह रहे हैं कि उनकी कोशिश अधिक से अधिक विपक्षी दलों को जोड़ने की है. कांग्रेस से कई दलों को चिढ़ है. आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और टीआरएस जैसे दल कांग्रेस को बीजेपी की तरह अपना दुश्मन मानते हैं. विपक्षी एकता में कांग्रेस का वर्चस्व उन्हें फूटी आंख नहीं सुहाएगा. यही वजह है कि ममता बनर्जी ने बड़ी चालाकी से नीतीश को यह सलाह दे डाली कि विपक्षी दलों की बैठक जेपी आंदोलन की भूमि पर यानी पटना में होनी चाहिए. इससे फायदा यह होगा कि कांग्रेस का वर्चस्व टूटेगा.

 

तीन-चार महीनों तक राहुल गांधी ने भारत जोड़ो यात्रा के जरिए अपनी खोई जमीन हासिल करने की पूरी कोशिश भी की थी. परसेप्शन भी कांग्रेस के प्रति ठीक होने लगा था. इस बीच सूरत की अदालत ने उन्हें दो साल की सजा सुना दी. यानी सजा अगर बरकरार रही तो वे अगले आठ साल तक चुनाव नहीं लड़ पाएंगे. हालांकि मामला अब हाईकोर्ट पहुंच गया है. किस्मत ने साथ दिया तो उन्हें राहत भी मिल सकती है. इसलिए कांग्रेस अपने पत्ते अभी खोल नहीं रही. अगर हाईकोर्ट से राहुल को राहत मिल जाती है तो निःसंकोच वे पीएम पद के दावेदार बन जाएंगे. अगर ऐसा न भी हुआ तो कांग्रेस अपना उम्मीदवार किसी और को बना सकती है. मल्लिकार्जुन खरगे तब सबसे बड़े दावेदार होंगे. कांग्रेस ने नीतीश को अभी यही टास्क दिया है कि वे समान विचारधारा वाले दलों को एकजुट करें. नेता के सवाल पर बाद में मिल-बैठ कर तय कर लेंगे. यही वजह है कि नीतीश पीएम पद के दावेदार बनने से हिचक रहे हैं.

 

नीतीश कुमार राजनीति के परिपक्व खिलाड़ी हैं. उन्हें विपक्ष और बीजेपी की ताकत का एहसास है. बिहार में वह 2014 में देख चुके हैं कि उनकी पार्टी कितने पानी में है. तब जेडीयू को 2 और आरजेडी को 4 सीटें मिली थीं. बीजेपी ने वह चुनाव भी नरेंद्र मोदी के नाम पर ही लड़ा था. उसे अकेले 22 सीटें आई थीं. 2019 में नीतीश कुमार जब बीजेपी के साथ आ गए तो 17 सीटों पर उम्मीदवार उतार कर जेडीयू ने 16 सीटें जीत ली थीं.जाहिर है नीतीश भी जानते हैं कि बीजेपी के खिलाफ एंटी इन्कम्बैंसी का असर चाहे जितना हो, लेकिन चेहरा नरेंद्र मोदी का ही रहने के कारण 2024 में बीजेपी को परास्त करना आसान नहीं होगा. अगर आरजेडी-जेडीयू की सम्मिलित ताकत हो, तब भी कम से कम बिहार में बीजेपी को धूल चटाना आसान नहीं होगा.

नीतीश कुमार को यह भी पता है कि अब लव-कुश समीकरण वाले भरोसेमंद साथी उनके साथ नहीं रहे. उपेंद्र कुशवाहा ने नीतीश के खिलाफ आरएलजेडी बना लिया है तो आरसीपी सिंह किसी दल के बैनर बिना ही स्वजातीय वोटों का नुकसान करने के लिए नीतीश के पीछे पड़े हैं. बीजेपी से उन्हें खाद-पानी मिल रहा है तो जाहिर है कि उन्हें संसाधनों की कोई कमी नहीं है. महागठबंधन में रहने के बावजूद नीतीश को भरोसा नहीं हो रहा कि उनकी पार्टी की स्थिति आसन्न लोकसभा चुनाव में 2020 के सेंबली इलेक्शन से शायद ही बेहतर हो पाए. ऐसे में उनके सामने नैतिक संकट खड़ा होगा. कम सांसदों के साथ वे कैसे पीएम पद की दावेदारी कर सकते हैं.

ऐसा नहीं है कि नीतीश को बैठे-बिठाए पीएम की कुर्सी मिल जानी है. इसके लिए देश भर में तूफानी भाग-दौड़ की जरूरत पड़ेगी. अगर वे पीएम उम्मीदवार बनते हैं तो उन्हें कुछ दिनों के लिए बिहार छोड़ना पड़ेगा.उनकी सीएम कुर्सी पर भी खतरा रहेगा. नीतीश कुमार ऐसा चाहेंगे नहीं. बिहार की सत्ता के लिए तो वे गठबंधन बदलते रहे हैं. कभी एनडीए के साथ तो कभी महागठबंधन से अपने रिश्ते जोड़ते रहे हैं. निश्चित छोड़ वे अनिश्चित की ओर जाने का जोखिम क्यों मोल लेना चाहेंगे? कुर्सी के लिए ही तो उन्होंने महागठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव को 2025 तक के लिए झुनझुना थमा दिया है.

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