महाकुंभ 1954: जब नेहरू के स्वागत में मची थी भगदड़, एक हजार लोगों की गई थी जान

जान बचाने पोल पर चढ़ गए थे कई लोग, करंट से चली गई थी जान

Deepak Sharma

सिटी पोस्ट लाइव

पटना: 1954 के महाकुंभ के दौरान आजाद भारत में पहली बार महाकुंभ का आयोजन इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में हुआ था। इस आयोजन का मुख्य आकर्षण 3 फरवरी को होने वाला मौनी अमावस्या स्नान था, जिस दिन लाखों श्रद्धालु संगम में स्नान के लिए पहुंचे थे।

पुश नोटिफिकेशन के लिए सब्सक्राइब करें।

उसी दिन, सुबह करीब 8-9 बजे, यह खबर फैल गई कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू कुंभ मेला देखने आ रहे हैं। जैसे ही यह सूचना जनता तक पहुंची, लोग पंडित नेहरू को देखने के लिए उमड़ पड़े। इस दौरान भीड़ बेकाबू हो गई और वह उसी दिशा में भागी जहां नागा साधु ठहरे हुए थे।

भयभीत नागा साधु, जिन्हें लगा कि भीड़ उनका हमला करने आई है, ने अपने हाथों में तलवार और त्रिशूल लेकर लोगों की ओर दौड़ना शुरू किया। इस अचानक उत्पन्न हुई स्थिति के कारण भगदड़ मच गई। जो लोग गिर गए, वे फिर उठ नहीं सके। जान बचाने के लिए कई लोग बिजली के खंभों पर चढ़कर तारों से लटक गए। इस दुर्घटना में लगभग 1000 लोग अपनी जान गंवा बैठे।

यूपी सरकार ने इस हादसे से इनकार किया और यह दावा किया कि कोई जानमाल का नुकसान नहीं हुआ, लेकिन एक फोटोग्राफर की तस्वीर ने सरकार के दावे को चुनौती दी और संसद में इस मुद्दे पर बवाल मच गया। प्रधानमंत्री नेहरू को भी इस पर संसद में बयान देना पड़ा।

वर्ष 1954 का महाकुंभ आजाद भारत का पहला था, और यह आयोजन बड़े पैमाने पर तैयारियों के साथ हुआ था। संगम के पास अस्थायी रेलवे स्टेशन बनाए गए थे, टूरिस्ट गाइडों की नियुक्ति की गई थी, और उबड़-खाबड़ जमीनों को समतल कर दिया गया था। इसके अलावा, सड़कें और रेलवे लाइन के ऊपर पुल भी बनाए गए थे।

पहली बार कुंभ मेला में बिजली के खंभे लगाए गए थे, और नौ अस्थायी अस्पताल खोले गए थे ताकि कोई भी दुर्घटना होने पर तुरंत इलाज किया जा सके, लेकिन कहा जाता है कि इस भगदड़ और हमले में 1000 से अधिक लोगों की जान चली गई थी। लोग इतने डर गए थे कि जान बचाने के लिए बिजली के खंभों पर चढ़ गए थे और कई लोग करंट की चपेट में आकर मर गए थे।

Share This Article