सिटी पोस्ट लाइव : बिहार चुनाव को लेकर C-Voter के मासिक ट्रैकर सर्वे ने बिहार की राजनीति में बड़े परिवर्तन के संकेत दे रहे हैं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की लोकप्रियता और उनके कामकाज से जनता संतुष्ट नजर आ रही है.तेजस्वी यादव की लोकप्रियता घटी जा रही है और प्रशांत किशोर तेजी से ऊपर बढ़ रहे हैं.सर्वे पर भरोसा करें तो बिहार की राजनीति एक रोचक मोड़ पर पहुँच गई है..तेजस्वी यादव की लोकप्रियता में कमी , नीतीश कुमार की यथास्थिति और प्रशांत किशोर के बढ़ते प्रभाव बिहार में नए सियासी समीकरणों के नये संकेत दे रहे हैं.
कानून-व्यवस्था पर उठ रहे सवालों के बीच स्वास्थ्य को लेकर चिंता और एंटी इंकंबेंसी जैसे कमजोर आधार के बावजूद नीतीश कुमार के काम से 58% लोग संतुष्ट हैं, लेकिन उनकी सार्वजनिक तौर पर सक्रियता और बार-बार गठबंधन बदलने की इमेज एनडीए के लिए चुनौती बनी हुई है. तेजस्वी यादव की लोकप्रियता का ग्राफ नीचे जा रहा है .सर्वे के अनुसार जन सुराज के प्रशांत किशोर की लोकप्रियता 14.9% से बढ़कर 18.4% तक पहुँच गई है. कास्ट पॉलिटिक्स से अलग अपील और युवा-शहरी वोटरों के समर्थन की ओर संकेत करता है.
C-Voter सर्वे के अनुसार, तेजस्वी यादव की लोकप्रियता फरवरी 2025 में 41% से घटकर जुलाई 2025 में 35% हो गई है. इस 6% की गिरावट के पीछे कई संभावित कारण हैं. जिमें यादव समुदाय के एक तबके में असंतोष है. विशेष रूप से, मोतिहारी में अजय यादव की सांप्रदायिक हिंसा में मौत पर तेजस्वी यादव और आरजेडी की चुप्पी ने इस समुदाय को निराश किया है. यादव समुदाय राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का कोर वोट बैंक है. जानकार बताते हैं कि यादव समुदाय मानता है कि सामाजिक एकता और सुरक्षा के मुद्दों पर तेजस्वी को और मुखर होना चाहिए था. समुदाय का एक हिस्सा यह कह रहा है कि “पहले समाज रहेगा, तब RJD या तेजस्वी होंगे”. यह नाराजगी RJD के पारंपरिक वोटर आधार को कमजोर कर सकती है.
बिहार की जनता के बीच लालू-राबड़ी शासन और “नीतीश राज” की तुलना एक बार फिर चर्चा में है.चुनाव का समय नजदीक आते ही लोगो तुलना करने लगे हैं और नीतीश कुमार की सरकार को लेकर लोगों के मन में उतनी नाराजगी नहीं है, भले ही उनकी सार्वजनिक उपस्थिति कम हो हो गई है. विकास और सुशासन के कुछ क्षेत्रों में जनता का भरोसा बनाए हुए हैं. C-Voter सर्वे के अनुसार, जून 2025 में 59% और जुलाई में 58% लोग नीतीश के कामकाज से संतुष्ट थे. इसके विपरीत तेजस्वी के उठाए गए बेरोजगारी और अपराध जैसे मुद्दे जनता को प्रभावित करने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाए हैं. NDA का “जंगलराज” का भय दिखाने वाला नैरेटिव तेजस्वी की छवि को नुकसान पहुंचा रहा है.
प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी बिहार की राजनीति में एक नए विकल्प के रूप में उभर रही है. C-Voter सर्वे में उनकी लोकप्रियता फरवरी में 14.9% से बढ़कर जून में 18.4% हो गई है और वे नीतीश कुमार को पछाड़कर दूसरे स्थान पर पहुंच गए हैं. प्रशांत किशोर का जाति-निरपेक्ष दृष्टिकोण और शहरी युवाओं व शिक्षित वर्ग के बीच बढ़ता समर्थन तेजस्वी के वोट बैंक, विशेष रूप से युवाओं और गैर-यादव पिछड़े वर्गों को प्रभावित कर रहा है. उनकी ताजा हवा की तरह उभरने वाली छवि तेजस्वी यादव की लोकप्रियता को चुनौती दे रही है.
तेजस्वी यादव और RJD की रणनीति में कुछ कमियां भी उनकी लोकप्रियता पर असर डाल रही हैं. उदाहरण के लिए, गठबंधन के भीतर सीट बंटवारे और सहयोगी दलों, जैसे- कांग्रेस के साथ तालमेल की कमी ने महागठबंधन की एकजुटता को कमजोर किया है. पप्पू यादव जैसे नेताओं ने तेजस्वी पर गठबंधन धर्म निभाने में विफलता का आरोप लगाया है जिससे विपक्षी खेमे में भ्रम की स्थिति बनी है.नीतीश कुमार ने हाल ही में महिलाओं के लिए सरकारी नौकरियों में 35% आरक्षण और शत-प्रतिशत डोमिसाइल नीति जैसे कदम उठाए हैं, जो महिला वोटरों को आकर्षित कर रहे हैं. बिहार में महिला मतदाता पुरुषों की तुलना में अधिक सक्रिय हैं (2020 में 59.7% महिला मतदान बनाम 54.6% पुरुष मतदान) और नीतीश की यह रणनीति तेजस्वी के युवा-केंद्रित नैरेटिव को कमजोर कर रही है.
नीतीश कुमार की लोकप्रियता में उतार-चढ़ाव देखा गया है. फरवरी में 18.4%, अप्रैल में 15.4% और जून में 17.4% लोगों ने उन्हें पसंदीदा मुख्यमंत्री के रूप में चुना. उनका स्वास्थ्य कारणों से जनता के बीच में कम आना उनकी छवि पर असर डाल रही है. C-Voter सर्वे के अनुसार, 58% लोग उनके काम से संतुष्ट हैं, लेकिन 41% असंतुष्ट भी हैं जो उनकी विश्वसनीयता में कमी का संकेत देता है. नीतीश की बार-बार गठबंधन बदलने की रणनीति (2022 में NDA से महागठबंधन, फिर 2024 में वापस NDA) ने उनकी विश्वसनीयता को प्रभावित किया है. इसके अलावा उनकी उम्र और कमजोर सार्वजनिक उपस्थिति ने JDU के लिए अगली पीढ़ी के नेतृत्व की कमी को उजागर किया है. फिर भी नीतीश का सुशासन और विकास का ट्रैक रिकॉर्ड, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में उन्हें एक मजबूत आधार देता है.
प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने बिहार की राजनीति में एक नया समीकरण जोड़ा है. उनकी लोकप्रियता में 4% की वृद्धि और जाति-निरपेक्ष अपील ने उन्हें युवाओं और शहरी वोटरों के बीच लोकप्रिय बनाया है. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि बिहार में जातिगत समीकरणों को तोड़ना आसान नहीं है और उनकी लोकप्रियता का वोटों में तब्दील होना अनिश्चित है. फिर भी, अगर वे 5-6% वोट शेयर भी प्राप्त कर लेते हैं तो यह NDA और महागठबंधन दोनों के लिए नुकसानदायक हो सकता है.
तेजस्वी यादव की लोकप्रियता में कमी के पीछे यादव समुदाय की नाराजगी, जंगलराज के नैरेटिव का फिर विमर्श में आ जाना, प्रशांत किशोर का उभार और महागठबंधन की रणनीतिक कमियां प्रमुख कारण हैं. वहीं, नीतीश कुमार की यथास्थिति बनी हुई है. लेकिन उनकी अनुपस्थिति और विश्वसनीयता में कमी JDU के लिए चुनौती है. जबकि, प्रशांत किशोर की एंट्री ने मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है और बिहार का चुनाव अब केवल NDA बनाम महागठबंधन तक सीमित नहीं है. बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था और बुनियादी ढांचे जैसे मुद्दे मतदाताओं के फैसले को प्रभावित करेंगे. आने वाले महीनों में नेताओं की रणनीति और जनता का मूड बिहार की सत्ता का फैसला करेगा.