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बिहार के सर्वाधिक मुस्लिम आबादी वाले जिले किशनगंज में इस विधानसभा चुनाव के परिणाम ने 20 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया है। जिले की चार विधानसभा सीटों में से इस बार 2005 के बाद पहली बार किसी हिंदू उम्मीदवार ने जीत हासिल की है। जनता दल यूनाइटेड (JDU) के प्रत्याशी गोपाल कुमार अग्रवाल ने ठाकुरगंज विधानसभा सीट पर जीत का परचम लहराया है।
ठाकुरगंज में 20 वर्ष बाद हिंदू उम्मीदवार की वापसी
किशनगंज जिले में राजनीतिक समीकरण आमतौर पर मुस्लिम समुदाय के पक्ष में झुके रहते हैं, जिससे यहां हिंदू समुदाय के उम्मीदवार का जीतना एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। जिले की चार सीटों में से ठाकुरगंज विधानसभा क्षेत्र में JDU के गोपाल कुमार अग्रवाल ने ‘तीर’ (JDU का चुनाव चिन्ह) को जीत दिलाई। यह जीत इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि अग्रवाल ने ठीक 20 साल बाद इस सीट पर वापसी की है। वह इससे पहले वर्ष 2005 में भी यहां से विधायक चुने गए थे।
अन्य तीन सीटों किशनगंज, कोचाधामन और बहादुरगंज पर मुस्लिम समुदाय के सदस्य विधायक बने हैं, जो क्षेत्र की राजनीतिक प्रकृति को दर्शाती है।
विधानसभा क्षेत्रों का समीकरण
जिले की चारों सीटों के पुराने रिकॉर्ड को देखें तो यह स्पष्ट होता है कि किशनगंज में मुस्लिम समुदाय का दबदबा रहा है:
किशनगंज विधानसभा: वर्ष 1969 से अबतक इस सीट पर एक भी हिंदू प्रत्याशी को जीत नहीं मिली है। 2025 के चुनाव में कमरूल हुदा ने यहां से जीत हासिल की, जो उपचुनाव में पहले भी विधायक रह चुके हैं।
कोचाधामन विधानसभा: यह सीट 2008 में गठित हुई और यहां 2010 से ही मुस्लिम विधायक जीतते आ रहे हैं। 2025 में सरवर आलम ने जीत दर्ज की, जो पहली बार चुनाव जीतकर विधायक बने हैं।
बहादुरगंज विधानसभा: वर्ष 1952 से 2025 के बीच इस सीट पर भी महज तीन बार ही हिंदू समुदाय के प्रत्याशी को जीत मिली है। इस बार तौसीफ आलम ने जीत हासिल की, जो पहले भी तीन बार विधायक रह चुके हैं।
इस पृष्ठभूमि में, ठाकुरगंज सीट पर गोपाल कुमार अग्रवाल की जीत ने जिले के राजनीतिक इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। यह जीत न केवल गोपाल अग्रवाल के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भी दिखाती है कि धार्मिक जनसांख्यिकी के बावजूद, जनता कभी-कभार व्यक्तिगत उम्मीदवार और उसके कार्य पर भी भरोसा जताती है।
इस चुनाव में जीते चार विधायकों में से तीन पहले भी विधानसभा सदस्य रह चुके हैं, जबकि कोचाधामन से सरवर आलम ने पहली बार जीत का स्वाद चखा है। किशनगंज की यह परिणाम राष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान आकर्षित करता है, जहां मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में समावेशी प्रतिनिधित्व की चर्चा होती रहती है।