अफसरशाही छोड़ बच्चों के बीच बैठीं DM प्रतिभा रानी, ब्लैकबोर्ड पर सवाल लिख परखी शिक्षा की हकीकत…

Ritu Raj

बिहार के शिवहर ज़िले में उस समय एक अनोखा और प्रेरणादायक दृश्य देखने को मिला, जब जिलाधिकारी प्रतिभा रानी ने अपने प्रशासनिक दायित्वों से हटकर एक शिक्षक की भूमिका निभाई। शिवहर के चमनपुर स्थित स्कूल में उनका यह अलग अंदाज़ न केवल चौंकाने वाला था, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति को सामने लाने वाला भी साबित हुआ।

जिलाधिकारी अचानक स्कूल के कक्षा-कक्ष में पहुंचीं और बच्चों के बीच बैठकर पढ़ाई के स्तर को करीब से समझने की कोशिश की। उन्होंने ब्लैकबोर्ड पर सवाल लिखवाए, बच्चों से जवाब सुने और सही उत्तर देने पर उनका उत्साह भी बढ़ाया। इस दौरान कक्षा का माहौल पूरी तरह सहज और उत्साहपूर्ण था। वही, बच्चों में न कोई झिझक थी और न ही किसी प्रकार का डर, बल्कि वे पूरे आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रख रहे थे। प्रतिभा रानी ने विशेष रूप से प्रारंभिक कक्षाओं पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने बच्चों से अंग्रेज़ी के शब्दों की स्पेलिंग और उनके अर्थ पूछकर उनकी पढ़ने-समझने की क्षमता का आकलन किया। बच्चों ने भी अपनी समझदारी और तत्परता से उन्हें प्रभावित किया। इसके साथ ही, उन्होंने बच्चों से शिक्षकों की नियमित उपस्थिति के बारे में भी सीधी बातचीत की, जिससे शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति का अंदाज़ा लगाया जा सके। स्कूल के प्रधानाध्यापक से नामांकन और उपस्थिति से जुड़ी जानकारी ली गई। जिलाधिकारी ने बच्चों को मन लगाकर पढ़ाई करने, आगे बढ़ने और अपने परिवार व जिले का नाम रोशन करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि शिक्षा ही सफलता और विकास की असली कुंजी है।

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इस अवसर पर नव-नामांकित बच्चों को नई किताबें वितरित की गईं, जिससे उनके चेहरों पर खुशी साफ झलक रही थी। साथ ही, अभिभावकों को भी यह संदेश दिया गया कि वे अपने बच्चों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करें और उनकी शिक्षा में सहयोग दें। जिलाधिकारी ने जिले में शत-प्रतिशत नामांकन का लक्ष्य तय करते हुए टोला सेवकों, विकास मित्रों और शिक्षकों को निर्देश दिया कि वे घर-घर जाकर हर बच्चे का स्कूल में दाखिला सुनिश्चित करें। विशेष रूप से उन बच्चों पर ध्यान देने को कहा गया, जो आंगनवाड़ी से निकलकर पहली कक्षा में प्रवेश के योग्य हो चुके हैं। शिवहर में जिलाधिकारी का यह प्रयास केवल एक औचक निरीक्षण नहीं रहा, बल्कि यह शिक्षा के क्षेत्र में एक सकारात्मक पहल और मिसाल के रूप में सामने आया, जो यह दिखाता है कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति हो, तो बदलाव संभव है।

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