फ्री का वादा, न मुफ्त की रेवड़ियां, न केजरीवाल का चेहरा आया काम,
सिटी पोस्ट लाइव : 27 साल बाद एकबार फिर से दिल्ली में सरकार बनाने में बीजेपी सफल हो गई. आम आदमी पार्टी जिसे लगातार दो चुनावों में प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाने का मौका जनता ने दिया था, इस चुनाव में उसकी मिटटी पलीद हो गई. अरविंद केजरीवाल ,मनीष सिसोदिया चुनाव हार गए.न फ्री का वादा काम आया, न मुफ्त की रेवड़ियां काम आईं और न ही ‘कट्टर ईमानदार’ अरविंद केजरीवाल का चेहरा काम आया. . AAP के तमाम दिग्गज चुनाव हार गए. सबके जेहन में ये सवाल है कि कभी 70 में से 67 और 62 सीटें जीतने वाली आम आदमी पार्टी को इस बार बुरी शिकस्त का सामना करना पड़ा?
2013 के अपने पहले चुनाव में आम आदमी पार्टी बीजेपी के बाद दूसरे नंबर पर रही थी लेकिन सरकार बनाने के लिए उसने उस कांग्रेस से हाथ मिला लिया , जिसके कथित भ्रष्टाचार के विरोध से राजनीति शुरू की थी. कांग्रेस के साथ गठबंधन वाली आम आदमी पार्टी की वो सरकार 2 महीने भी नहीं टिकी. उसके बाद 2015 में 70 में से 67 और 2020 में 70 में से 62 सीटों पर जीत के साथ इतिहास रचा. पार्टी लगातार 10 सालों तक दिल्ली की सत्ता में रही.
जिस पार्टी ने भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन से जन्म लिया, सत्ता में आने पर वह भी अपने दामन को करप्शन की कालिख से नहीं बचा पाई. खुद को कट्टर ईमानदार कहने वाले अरविंद केजरीवाल को करप्शन का दाग भारी पड़ा. भ्रष्टाचार के आरोपों में उन्हें खुद जेल जाना पड़ा. मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन को जेल जाना पड़ा. केजरीवाल और आम आदमी पार्टी लगातार खुद के कट्टर ईमानदार होने की दुहाई देते रहे लेकिन दिल्ली की जनता ने उनको नकार दिया.
अरविंद केजरीवाल ने एक नई तरह की साफ-सुथरी, ईमानदार और वैकल्पिक राजनीति का वादा किया था. लेकिन सीएजी की रिपोर्ट को विधानसभा की पटल तक पर नहीं रखा. अरविंद केजरीवाल ने जेल में जाने के बाद भी इस्तीफा नहीं दिया. ईमानदारी की राजनीति के कथित चैंपियन केजरीवाल ने तो जेल से सरकार चलाने की ऐसी जिद दिखाई जो भारत की राजनीति में कभी नहीं हुआ. जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने इस्तीफा जरूर दिया लेकिन शायद तबतक बहुत देर हो चुकी थी.
अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी ने पहली बार सत्ता में आने के बाद मुफ्त-बिजली पानी वाला मॉडल पेश किया. सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की दशा में भी सुधार का दावा किया. सुधार हुए भी, लेकिन उतने भी नहीं जितना आम आदमी पार्टी ढिंढोरा पीटती है. इस मॉडल की बदौलत दो बार सरकार भी बनाई लेकिन पार्टी इससे आगे नहीं बढ़ पाई. हर नाकामी का ठीकरा दूसरों पर फोड़ने का चलन चलाया. सड़कें बदहाल रहीं. जगह-जगह गंदगी का अंबार रहा. निगम चुनाव में जीत के बाद साफ-सफाई की जिम्मेदारी से भाग भी नहीं सकते थे. यमुना को साफ करने पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए लेकिन कुछ नहीं बदला.दूसरी तरफ, बीजेपी ने भी केजरीवाल के खिलाफ उसी हथियार का इस्तेमाल किया जो उनकी ताकत थी, केजरीवाल की फ्रीबीज पॉलिटिक्स को बीजेपी ने अपना लिया. बीजेपी ने भी महिलाओं को हर महीने 2500 रुपये, त्योहारों पर मुफ्त सिलिंडर, बुजुर्गों के लिए बढ़ी हुई पेंशन, मुफ्त इलाज जैसे लोकलुभावन वादे किए. साथ में ये भी कि आम आदमी पार्टी की सरकार की तरफ से चलाई जा रहीं मुफ्त वाली योजनाओं को भी जारी रखेंगे.
दिल्ली में आम आदमी पार्टी की हार के कारणों में केंद्रीय बजट को भी गिना ही जाएगा. चुनाव से ठीक पहले जिस तरह बजट में मध्यम वर्ग को बड़ी सौगात दी गई, 12 लाख रुपये तक की आमदनी और वेतनभोगियों के मामले में तो 12.75 लाख रुपये तक की सालाना आमदनी को इनकम टैक्स से मुक्त करने का जो ऐलान हुआ, उसका सीधा लाभ बीजेपी को दिल्ली चुनाव में मिला है.
दिल्ली में आम आदमी पार्टी की हार का एक बड़ा कारण खुद के ‘अजेय होने का दंभ’ भी रहा. इसी दंभ में पार्टी ने गठबंधन के लिए बढ़ाए गए हाथ को झटक दिया. अरविंद केजरीवाल का दंभ बार-बार दिखा. विधानसभा में उनका वो अट्टहास, कश्मीरी पंडितों के नरसंहार पर बनी एक फिल्म को प्रॉपगैंडा बताते हुए ‘यू-ट्यूब पर रिलीज कर दो’ का तंज भी उनके खुद के अजेय होने के दंभ का ही परिचायक था. फिल्म प्रॉपगैंडा थी या नहीं, लेकिन केजरीवाल ने कश्मीरी पंडितों के नरसंहार को ही एक तरह से झुठलाने की कोशिश की. इससे उन पर एक खास समुदाय के तुष्टीकरण के आरोप लगे. डैमेज कंट्रोल के लिए ही उन्होंने मंदिर के पुजारियों और गुरुद्वारों के ग्रंथियों को भी हर महीने एक निश्चित रकम देने का वादा किया. लेकिन ये भी काम नहीं आया.