निशांत बने JDU के लिए जरुरी, धर्म-संकट में हैं CM नीतीश कुमार .

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हमेशा वंशवादी राजनीति का विरोध किया… अब नीतीश कुमार के बेटे सियासत में आए तो क्या होगा?

सिटी पोस्ट लाइव :तीन दशक पहले जब लालू प्रसाद यादव पर भ्रष्टाचार, जंगलराज के आरोप लगे, तब नीतीश कुमार ने जनता दल से अलग होकर जॉर्ज फर्नांडिस के साथ समता पार्टी बनाई. उन्होंने BJP के साथ दोस्ती कर ली. 2005 में लालू-राबड़ी शासन को हटाकर वह बिहार के मुख्यमंत्री बने.अगर जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनाने को छोड़ दें, तो पिछले करीब दो दशकों से बिहार की सत्ता नीतीश के ही हाथों में रही है. सुविधा और जरूरत के हिसाब से वह अपने दोस्त बदलते रहे हैं. हर रिश्ते में शर्त यही रही कि सीएम पद बरकरार रहे.

 विधानसभा चुनाव करीब हैं.हमेशा वंशवाद के खिलाफ रहे नीतीश कुमार  अपनी पार्टी को बचाने के लिए  वंशवाद की राजनीति करने पर मजबूर हैं. BJP यह तो कहती है कि विधानसभा चुनाव नीतीश के नेतृत्व में लड़ा जाएगा, लेकिन मुख्यमंत्री के सवाल पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का जवाब रहा कि ऐसे फैसले पार्टी का संसदीय बोर्ड करता है.लेकिन सबसे बड़ा सवाल- NDA का सीएम BJP का संसदीय बोर्ड कैसे चुन सकता है? शाह के इस बयान से  सस्पेंस बढ़ गया है.सियासी जरूरतों के चलते BJP ने महाराष्ट्र में कम विधायकों वाली पार्टी, शिवसेना शिंदे गुट को सीएम पद दे दिया. एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में ही विधानसभा चुनाव लड़ा गया, लेकिन इलेक्शन बाद अधिक सीटों के आधार पर फिर BJP ने अपना सीएम बना दिया. इसी वजह से बिहार में नीतीश के भविष्य पर सवाल उठ रहे हैं.

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2020 के विधानसभा चुनाव में JDU को केवल 43 सीटें मिलीं. इसके बाद भी BJP ने नीतीश को ही सीएम बनाया. नीतीश को इतना नुकसान चिराग पासवान की वजह से उठाना पड़ा, जिन्होंने JDU के सामने अपने उम्मीदवार खड़े कर दिए थे. नीतीश ने इसके पीछे BJP का हाथ माना और शायद इसी से खफा होकर वह लालू और कांग्रेस के गठबंधन में चले गए. पिछले साल लोकसभा चुनाव से ठीक पहले उनकी NDA में वापसी हुई. BJP को इसका फायदा भी हुआ, पर विधानसभा चुनाव के मद्देनजर अब नए समीकरण बनाए जाने लगे हैं.

243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में बहुमत के लिए 122 सीटें चाहिए. पिछली बार BJP और JDU ने मिलकर 125 सीटें जीती थीं. लालू के महागठबंधन को 110 सीटें मिली थीं. इस बार BJP चाहती है कि उसका अपना आंकड़ा सौ के आसपास पहुंच जाए ताकि राज्य में पार्टी का सीएम बनाने का सपना पूरा हो सके. बहुमत का बाकी जुगाड़ दूसरे सहयोगी दलों से हो सकता है. लेकिन, ऐसा तभी होगा जब लालू और नीतीश का प्रदर्शन बेहद खराब हो. अगर BJP ज्यादा सीटों के आधार पर अपना सीएम बनाना चाहेगी, तो नीतीश शायद ही डिप्टी सीएम पद के लिए तैयार हों.

नीतीश के बेटे निशांत कुमार पिता के साथ सीएम आवास में ही रहते हैं, लेकिन पहले कभी संकेत नहीं मिला कि वह राजनीति में सक्रिय होंगे. पिछले दिनों उन्होंने पहली बार राजनीतिक टिप्पणी की और तभी से कयास लगने लगे. तेजस्वी यादव के अलावा कुछ BJP नेताओं ने भी निशांत के राजनीति में आने का स्वागत किया.अब निशांत जिस तरह मुख्यमंत्री निवास में JDU नेताओं के साथ होली खेलते दिखे और फिर उसके फोटो-पोस्टर सार्वजनिक किए गए, उसे राजनीति में प्रवेश का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है.



कुछ लोग मानते हैं कि अगर निशांत राजनीति में नहीं आए तो चुनाव के पहले या फिर बाद में JDU बिखर जाएगा. निशांत को लाकर ही नीतीश के वोट बैंक को बिखरने से बचाया जा सकता है. इसमें भविष्य की सत्ता राजनीति भी देखी जा रही है. BJP अगर JDU के बिना सरकार बनाने की स्थिति में नहीं हुई, तो निशांत को डिप्टी सीएम बनाया जा सकता है. अगर RJD सबसे बड़ा दल बना तो वह भी एक बार फिर नीतीश की सत्ता की पालकी उठाने के बजाय निशांत को उप-मुख्यमंत्री बनाना पसंद करेगा. सत्ता के खेल ने कभी वंशवादी राजनीति के मुखर विरोधी रहे नीतीश कुमार को अब उसी वंशवादी राजनीति का राही बनने को मजबूर कर दिया है

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