नीतीश कुमार कैसे बने CM , आजतक उन्हें इस जर्सी से क्यों नहीं हिला पाई BJP?

City Post Live

सिटी पोस्ट लाइव : संयुक्त बिहार के वर्ष  2000 में आखिरी विधानसभा चुनाव में RJD सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी.उसे 124 सीटें मिलीं.RJD के बाद दूसरे नंबर पर 67 सीटों के साथ बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनी थी. नीतीश कुमार की समता पार्टी को 34 और शरद यादव की JDU को 21 सीटों पर जीत मिली थी. इन तीनों को जोड़ने के बाद भी कुल नंबर 122 हो रहा था, जो RJD से कम था.324 सदस्यीय विधान सभा में तब सरकार बनाने के लिए 163 विधायकों का होना जरुरी था.बहुमत का जादुई आंकड़ा किसी के पास नहीं था  ऐसे में केंद्र सरकार का खेल  खेल शुरू हुआ. केंद्र में NDA की सरकार थी. अटल बिहारी वाजपेयी PM थे. नीतीश कुमार केंद्र में मंत्री थे. अटल बिहारी वाजपेयी ने फैसला लिया कि नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बनेंगे. राज्य में ‌BJP और JDU ने उन्हें अपना समर्थन दिया.

3 मार्च 2000 को राज्यपाल विनोद चंद्र पांडेय ने नीतीश कुमार को CM पद की शपथ दिलाई. बहुमत साबित करने के लिए एक सप्ताह का समय मिला. लेकिन राजनीति के माहिर खिलाड़ी लालू तब 23 सीटों पर जीती कांग्रेस को मनाने में सफल रहे और नीतीश को सीएम पद से हटना पड़ा. राबड़ी देवी सीएम बनीं.अक्टूबर 2005 में जब बिहार की सियासत में नीतीश काल का आगाज हुआ, तब बीजेपी के बड़े चेहरे में शुमार थे सुशील कुमार मोदी. बीजेपी में ये वो चेहरा थे जिन्हें न केवल संगठन की शानदार समझ थी, बल्कि ये लालू और नीतीश के समकक्ष के नेता माने जाते थे.तब 55 सीटों वाली बीजेपी ने सुशील मोदी को नीतीश सरकार में डिप्टी सीएम बनाने का निर्णय लिया.सुशील मोदी और नीतीश की जोड़ी ने लगातार 8 साल तक राज किया.

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सुशील मोदी पर यह आरोप लगता रहा कि सरकार में शामिल होने के बाद वे भाजपा के विकास के लिए कम और नीतीश कुमार के इशारे पर ज्यादा काम करते हैं.यही कारण है कि जब तक सुशील मोदी पार्टी में पावरफुल रहे, बीजेपी की सेकेंड लीडरशिप तैयार नहीं हो पाई. प्रदेश संगठन में सुशील मोदी के समर्थकों की संख्या इतनी अधिक हो गई कि किसी दूसरे नेता के लिए पांव जमाना मुश्किल हो गया था. प्रदेश अध्यक्ष रहने के बाद भी पार्टी के दिग्गज नेता रहे सीपी ठाकुर को टिकट बंटवारे की आजादी नहीं दी गई. लाचार होकर उन्हें पार्टी से इस्तीफा देना पड़ा. दूसरे बड़े लीडर ताराकांत झा को विधान परिषद का सभापति होने के बावजूद दोबारा नहीं चुना गया. ऐसे कई उदाहरण हैं, जो बताते हैं कि सुशील मोदी भले सरकार में थे लेकिन, संगठन में उन्होंने किसी को उभरने नहीं दिया.

2010 में जब नीतीश कुमार नरेंद्र मोदी के साथ विज्ञापन में एक फोटो छपने पर नाराज हुए, भोज को रद्द कर दिया तब सुशील मोदी ही वो शख्स थे जो आडवाणी की मदद से नीतीश कुमार को मनाने में कामयाब हुए थे.बिहार में बीजेपी का CM नहीं बनने के सवाल पर संगठन के बड़े और पुराने नेता बताते हैं, ’इसका सबसे बड़ा कारण है बीजेपी के पास गैर वैश्य OBC चेहरे का नहीं होना. पार्टी के पास इस कैटेगरी का कोई नेता नहीं है, जो ये सामने आकर कहे कि आपके आरक्षण को कोई खत्म नहीं कर सकता.

पार्टी पिछले एक दशक से कई प्रयोग कर चुकी है. चाहे सुशील मोदी के पैरलल नंद किशोर यादव को खड़ा करने का प्रयास हो या सुशील मोदी की पैठ को नित्यानंद राय के सहारे समाप्त करने की कोशिश हो. पार्टी का प्रयास लगभग विफल रहा है.’2020 के बाद पार्टी की तरफ से कई प्रयोग किए गए हैं. पहली बार पार्टी ने एक कुशवाहा नेता को ताकतवर बनाया है. 2005 के बाद आज तक पार्टी किसी कुर्मी नेता को मंत्री नहीं बनाती थी, लेकिन 2025 में कुर्मी समाज से आने वाले कृष्ण कुमार मंटू को मंत्री बनाया गया है. पार्टी ने धानुक शंभू शरण पटेल और चंद्रवंशी समाज के नेता भीम सिंह को राज्यसभा भेजा है. पार्टी की कोशिश है कि उन्हें ताकतवर बनाया जाए और नए नेतृत्व को उभारा जाए.

बीजेपी 2020 के विधानसभा चुनाव में JDU से लगभग दोगुना सीट जीतने के बाद भले नीतीश कुमार के सामने छोटा भाई बनना स्वीकार कर ली. लेकिन इन 5 वर्षों में पार्टी ने नई लीडरशिप खड़ा करने की कोशिश की है. 2025 विधानसभा चुनाव को इसका लिटमस टेस्ट माना जा रहा है.2024 के लोकसभा चुनाव से ही पार्टी सम्राट चौधरी को बिहार बीजेपी के नया लीडर के रूप में प्रोजेक्ट कर रही है. उनके नेतृत्व में भले पार्टी लोकसभा चुनाव में बेहतर परफॉर्मेंस नहीं कर पाई, लेकिन ऐसा पहली बार है जब बीजेपी की तरफ से गैर वैश्य ओबीसी और कुशवाहा समाज के एक नेता को प्रोजेक्ट किया जा रहा है.कोइरी और कुर्मी के जिस समीकरण के सहारे नीतीश कुमार अब तक पॉलिटिक्स करते आए हैं, उनके कमजोर होते ही बीजेपी उस वोट बैंक को दरकने और बिखरने के बजाय अपने साथ जोड़ने की कोशिश में जुट गई है.

बिहार में बीजेपी की आज भी इतनी क्षमता नहीं है कि वो अकेले लालू यादव को हरा सके. बीजेपी में जब अटल-आडवाणी का एरा था तब भी उन्होंने लालू यादव को हराने की कई कोशिशें की, लेकिन वे अकेले कभी कामयाब नहीं हो सके. लालू यादव आज भी बिहार की राजनीति की एक धुरी हैं. नीतीश कुमार पिछले 20 साल से सीएम हैं, लेकिन आज भी चुनाव में जंगल राज की ही याद दिलाई जाती है.आज बिहार की सबसे बड़ी पार्टी जरूर है लेकिन नेतृत्व का संकट आज भी पार्टी के भीतर बरकरार है. एक भी नेता ऐसा नहीं है, जो क्राउड पुलर हो. जैसे लालू यादव पर राज करते हैं, नीतीश कुमार को कुर्मी का नेता माना जाता है. लेकिन बीजेपी के पास ऐसा कोई चेहरा आज भी नहीं है.’

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