सिटी पोस्ट लाइव : सुदूर खेतों में लहलहाते खेतों के बीच एक साइज और एक ही मॉडल के बने 65 से ज्यादा मकान…चमचमाती सड़कें… दूधिया रोशनी में जगमगती गलियां आधुनिक सुविधाओं वाला स्पोर्ट्स कॉम्पलेक्स, आधुनिक हरे और नीले रंग के एस्ट्रोटर्फ वाला स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स.. बैडमिंटन के कोर्ट… मॉडल स्कूल, हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर.. आंगनबाड़ी केंद्र और सामुदायिक भवन .विश्वास नहीं होता कि ये बिहार का एक गावं है आराजी बाबरचक .
सीएम नीतीश कुमार अपनी प्रगति यात्रा में 2 फरवरी को यहां पहुंचेंगे. वे अपने इस ड्रीम village प्रोजेक्ट का उद्घाटन करेंगे.65 ऐसे लोग जो ताउम्र बेघर और भूमिहीन रहे हैं उन्हें वे इस अल्ट्रा मॉडर्न विलेज के घरों की चाबी भी देंगे. आराजी बाबरचक गांव बिहार का पहला स्मार्ट विलेज है.ये वही गांव है, जहां कभी मुस्लिमों की बड़ी आबादी हुआ करती थी. भागलपुर दंगे के दौरान यहां रहने वाले सभी लोग अपनी जान बचाने के लिए आस-पास के गांव में जाकर बस गए. अब जब बिहार के पहले स्मार्ट विलेज को बसाया जा रहा है तो इसमें एक भी अल्पसंख्यक शामिल नहीं हैं. यहां EBC, OBC और बेघर दलित को बसाया जा रहा है.
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9 करोड़ रुपये की लगत से 7 एकड़ बंजर भूमि पर बना ये smart विलेज को स्मार्ट विलेज बनाने का प्रस्ताव जिला प्रशासन ने 2023 में बिहार सरकार को प्रस्ताव भेजा था. दो साल बाद अब ये गांव बनकर तैयार है. इसे सरकार के अभियान बसेरा योजना के तहत किया गया है.स्मार्ट विलेज को टाउनशिप के तर्ज पर बनवाया गया है. इसमें पीने का साफ पानी और बिजली, पक्की नली-गली, नल-जल की व्यवस्था है. बच्चों के लिए स्कूल, खेल का मैदान, जिसमें बास्केटबॉल कोर्ट, बैडमिंटन कोर्ट, एथलेटिक ट्रैक, फुटबॉल, क्रिकेट का मैदान हैं. मंदिर, आंगनबाड़ी केंद्र, छठ के लिए तालाब, ग्रामीण हाट, पोषण वाटिका, सामुदायिक भवन, हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर, जल मीनार, 100 सूर्य ऊर्जा से प्रभावित लाइट लगाई गई है. वहीं, सूर्य घर भी बनवाया गया है. स्मार्ट विलेज के दूसरे फेज में स्मॉल इंडस्ट्री भी लगाई जाएगी, ताकि गांववालों के लिए रोजगार के अवसर पैदा हों.
स्मार्ट विलेज में अपना घर होना गरीब भुमिहों के लिए किसी सपने से कम नहीं है. झोपड़ी में सांप-बिच्छू के बीच बारिश में टपकते कच्चे घर में रहनेवाले लोगों को अपने सपने का घर मिल गया है.1989 में भागलपुर में हुए सांप्रदायिक दंगे की आंच बांका जिले के बाबरचक गांव तक पहुंची थी. दंगे की आंच से बचने के लिए लोग पलायन करने लगे थे. तब यहां आबादी करीब 800 थी और अल्पसंख्यक मुस्लिम परिवार गुजर बसर करता था. यहां बसने वाले अल्पसंख्यक समुदाय के लोग अपनी जमीन को औने-पौने दाम में बेचकर धोरैया, अमरपुर, गोराडीह, कटोरिया, कहलगांव जैसे जगह पर जाकर बस गए, तब से यह हिस्सा खाली पड़ा हुआ था