बिहार में कांग्रेस अकेले लडेगी चुनाव, जान लीजिये फाइनल जबाब….

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बिहार चुनाव में कांग्रेस की रणनीति – अकेले या गठबंधन!

सिटी पोस्ट लाइव :बिहार में कांग्रेस अभी सबसे ज्यादा चर्चा में है. सबसे अधिक चर्चा इस बात को लेकर हो रही है कि क्या कांग्रेस अकेले विधानसभा चुनाव लड़ेगी? दरअसल, पिछले कुछ दिनों में कांग्रेस संगठन में इतने बड़े फेर-बदल हुए है कि ऐसी चर्चा जोर पकड़ रही है.पहला निर्णय बिहार प्रभारी के पद से मोहन प्रकाश की विदाई और उनकी जगह कृष्णा अल्लावारू को प्रभारी बनाने का है. दूसरा- जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार को अपनी यात्रा का नेत्रित्व सौंपना है.तीसरा- राज्यसभा के सदस्य डॉ. अखिलेश प्रसाद सिंह की जगह विधायक राजेश कुमार को प्रदेश अध्यक्ष पद पर बिठाना है.इन तीनों निर्णयों की व्याख्या इस रूप में की जा रही है कि कांग्रेस आरजेडी  की छाया से निकल कर अपने पुराने जनाधार को हासिल करना चाह रही है.

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मोहन प्रकाश राजद से मोलभाव के समय आक्रामक नहीं हो सकते थे.इसलिए कृष्णा अल्लावारु को उनकी जगह लाया गया. कन्हैया विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव की काट के रूप में काम करेंगे, क्योंकि रोजगार और सरकारी नौकरी का वादा ही राजद का मुख्य चुनावी मुद्दा है.डॉ. अखिलेश प्रसाद सिंह की पृष्ठभूमि आरजेडी  की रही है. इसलिए वह लालू प्रसाद के सामने बैठकर सीटों पर मोलभाव नहीं कर सकते हैं.

ये सबको पता है कि अखिलेश प्रसाद सिंह और लालू यादव एक दुसरे पर ज्यादा भरोसा करते कन्हैया कुमार को लालू यादव और तेजस्वी यादव पसंद नहीं करते.लालू यादव के भरोसेमंद नेता को किनारे कर उनके सबसे न-पसंद नेता कन्हैया को आगे लाकर कांग्रेस ने अपने स्टैंड में बड़ा बदलाव का संकेत दिया है.पिछले लोक सभा चुनाव में कांग्रेस पप्पू यादव को पूर्णिया से चुनाव लड़ना चाहती थी लेकिन लालू यादव के विरोध के कारण नहीं लड़ा पाई.उन्हें निर्दलीय लड़ना पड़ा.लेकिन इसबार लालू यादव की पसंद-ना-पसंद की परवाह कांग्रेस ने नहीं की.

सबके जेहन में एक ही सवाल है -क्या इन बदलावों से कांग्रेस मजबूत होने जा रही है? व्यावहारिक पक्ष यह है कि 1990 में बिहार की सत्ता से अलग होने के बाद हरेक विधानसभा से पहले कांग्रेस कुछ नया प्रयोग करती रही है. परिणाम यह बता रहा है कि तमाम प्रयासों के बावजूद 2015 को छोड़ दें तो हर विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की कुछ सीटें कम ही होती गईं.कांग्रेस ने 2010 में आरजेडी से अलग होकर चुनाव लदी  लेकिन सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद उसे केवल चार सीटों पर सफलता मिली. अंतत: 2015 में वह आरजेडी  गठबंधन में शामिल हुई. उसे 27 सीटों पर सफलता मिली.2020 में कांग्रेस 70 सीटों पर चुनाव लड़ी और 19 पर जीती.

जाहिर है कांग्रेस इतनी मजबूत नहीं हो गई है कि वह अकेले चुनाव लड़े और इतनी सीटें जीत जाए, जिससे उसके सहयोग के बिना किसी की सरकार नहीं बने.इसे ज्यादातर कांग्रेसी भी स्वीकार करते हैं  कि सत्ता से अलग होने के साथ ही वह जनाधार भी गंवाती चली गई और उसे फिर से जोड़ने के लिए कोई सार्थक प्रयास नहीं किया गया. बहुलता में उसके सवर्ण वोटर एनडीए के साथ चले गए. मुसलमानों और पिछड़ों ने समाजवादी पृष्ठभूमि के दलों को पकड़ लिया. अनुसूचित जाति के वोटर प्रसाद की तरह दलों में बंटते चले गए.

बिहार में किसी भी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का कार्यकाल निश्चिंत भाव से काम करने वाला नहीं रहा. कांग्रेस राज्य की पहली ऐसी पार्टी है, जिसके प्रदेश अध्यक्षों ने सबसे अधिक दल बदल किया.तारिक अनवर, चौधरी महबूब अली कैसर, अशोक चौधरी, अनिल शर्मा, रामजतन सिन्हा आदि का नाम इस सूची में शामिल किया जा सकता है. इनमें तारिक अनवर और रामजतन सिन्हा फिर कांग्रेस में लौट आए हैं. पार्टी छोड़ते समय इन सबने तत्कालीन आलाकमान पर यह आरोप लगाया कि उनके काम में अकारण दखल दिया जा रहा था.

कांग्रेस के नए प्रदेश अध्यक्ष राजेश कुमार इस समय सबको साथ लेकर चलने का दावा कर रहे हैं, लेकिन उनके समर्थक अभी से ही निवर्तमान प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश सिंह के विरुद्ध मोर्चा खोलकर बैठे नजर आ रहे हैं. कुल मिलाकर स्थितियां कांग्रेस के किसी समर्थक को इस हद तक उत्साहित नहीं होने दे रही हैं कि वह अकेले चुनाव लड़कर सम्मानजनक सीटें हासिल करने के बारे में सोचे.यहीं कारण है कि दिल्ली की बैठक में ज्यादातर बिहार के कांग्रेसियों ने राहुल गांधी को आरजेडी के साथ चुनाव लड़ने का सुझाव दिया.

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