बिहार BJP की नई टीम तैयार, 45% सवर्ण,नई लिस्ट में भी सम्राट चौधरी का दबदबा.

City Post Live

सिटी पोस्ट लाइव : बिहार में  संगठन को नए सिरे से खड़ा करने की कोशिश बीजेपी कर रही है. नये जिलाध्यक्ष , बूथ अध्यक्ष  नए चुने जा रहे हैं. इसमें केवल उन्हें ही तवज्जो दी जा रही है, जो शुरू से भाजपाई हैं.जिला स्तर के संगठन में सवर्णों का दबदबा दिखा रहा है. जिलाध्यक्षों की लिस्ट में 45% सवर्ण हैं. इनमें ब्राह्मण, भूमिहार और राजपूत के साथ कायस्थ को जगह दी गई है. सवर्ण के बाद सबसे ज्यादा तवज्जो कुशवाहा को दी गई है. पार्टी की तरफ से 10 जिलों की कमान कोइरी और कुर्मी के हाथ में दी गई है. अगर इनमें यादव को शामिल कर दें तो लगभग 20% जिला अध्यक्ष पिछड़ा वर्ग से है.

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अतिपिछड़ा की बात करें तो पार्टी ने इलाकावार उनकी आबादी के हिसाब से उन्हें जिले के संगठन में हिस्सेदारी दी है. इस वर्ग में मल्लाह के अलावा, हलवाई, कानू और भगत की कैटेगरी से आने वाले नेताओं पर भी पार्टी ने दांव लगाया है. मुस्लिम समुदाय से एक भी व्यक्ति को मौका नहीं दिया है.नई लिस्ट से साफ़ है जाति के गणित को भी साधने की भरपूर कोशिश की गई  है. ऐसे जिलाध्यक्ष जिनका परफॉर्मेंस लोकसभा चुनाव में बेहतर रहा है, उन्हें रिपीट किया गया है.शेखपुरा में पहली बार बीजेपी की तरफ से यादव समाज से आने वाली रेशमा भारती को अध्यक्ष बनाया गया है. यहां जीत-हार तय करने में तीन जातियों की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है. भूमिहार, कोइरी-कुर्मी और यादव.

बड़े जिलों को दो संगठन जिला में बांटा गया है, वहां एक सवर्ण और एक पिछड़ा समाज से जिलाध्यक्ष बनाया गया है. बेतिया में रुपक श्रीवास्तव तो इसी जिले के बगहा में EBC समाज से आने वाले रामेश्वर प्रसाद को जिलाध्यक्ष बनाया गया है. लगभग यही फॉर्मूला समस्तीपुर, वैशाली और सीवान समेत अन्य जिलों में भी अपनाया गया है.संगठन में मात्र 2 महिलाओं को जगह दी गई है, जो 4 प्रतिशत से भी कम है.

पार्टी की तरफ से सीवान, छपरा, समस्तीपुर, वैशाली, मुजफ्फरपुर और दरभंगा को दो अलग-अलग संगठन जिला में बांटा गया है.दरअसल, पार्टी ने उन जिलों को दो हिस्से में बांट दिया है जहां एक जिले में दो लोकसभा क्षेत्र पड़ते हैं. जैसे सीवान में महाराजगंज और सीवान लोकसभा क्षेत्र है. दोनों को पूरी तरह अलग कर दिया गया है.  समस्तीपुर जिले को समस्तीपुर और उजियारपुर लोकसभा क्षेत्र के हिसाब से बांटा गया है. बीजेपी के इस फैसले को परिसीमन से जोड़कर भी देखा जा रहा है. दरअसल, 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले नए परिसीमन की बात कही जा रही है. पार्टी अभी से इसकी तैयारी में जुट गई है.

जिला अध्यक्षों के चयन में पार्टी ने दो बात का सख्ती से पालन किया है. पहला उम्र 60 पार न हो, दूसरा अध्यक्ष वही बने जो पार्टी के वफादार सिपाही रहे हों या फिर जिनका बैकग्राउंड संघ से जुड़ा हो. ऐसे नेता को अध्यक्ष बनाया गया है, जो दूसरे दल से बीजेपी में आए हैं.हालांकि, जिन्हें भी बनाया गया है वे कम से कम 8-10 साल से भाजपा से जुड़े हैं. अगर नए अध्यक्षों के औसतन उम्र की बात करें तो ये 50-55 के बीच है. संगठन में सम्राट चौधरी का दबदबा अब भी बरकरार है. लगभग 22-25 जिलाध्यक्षों को रिपीट किया गया है. ये वही जिलाध्ययक्ष हैं, जिनका चयन सम्राट चौधरी ने किया था. इससे ये तो तय हो गया है कि भले सम्राट चौधरी को संगठन की जिम्मेदारी से दूर किया गया है, लेकिन संगठन पर उनका दबदबा अब भी बरकरार है. हालांकि, अभी दिलीप जायसवाल की तरफ से अभी प्रदेश स्तर के पदाधिकारियों की घोषणा नहीं की गई है

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