विधान सभा चुनाव लड़कर किसके लिए बड़ी चुनौती बनना चाहते हैं चिराग पासवान?

Manisha Kumari

तेजस्वी या नीतीश…चिराग के बिहार चुनाव लड़ने से किसकी सिरदर्दी बढ़ेगी, कितना बड़ा है यह दांव?

सिटी पोस्ट लाइव : 2020 के विधान सभा चुनाव की तरह 2025 के चुनाव में भी सबसे ज्यादा चर्चा में चिराग पासवान हैं.अकेले चुनाव लड़कर चिराग पासवान भले एक सीट भी नहीं जीत पाये लेकिन उन्होंने खुद को बिहार के भावी सीएम के रूप में स्थापित जरुर कर लिया था.केंद्र की राजनीति में जाने के बाद यानी केंद्र में मंत्री बनने के बाद लोग मानकर चलने लगे थे कि वो भी अपने पिता की तरह केंद्र की राजनीति करेगें.सर्वे में भी वो पीछे दिखाई देने लगे थे.लेकिन एकबार फिर बिहार विधान सभा चुनाव लड़ने का ऐलान कर वो चर्चा के केंद्र में आ गये हैं.एकबार फिर उन्हें सीएम के दावेदार के रूप में देखा जाने लगा है.

रविवार को एक बड़ी खबर आई कि लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) ने चिराग पासवान को बिहार विधानसभा चुनाव लड़ाने का फैसला लिया है. जब पार्टी ने यह फैसला लिया है तो इसके इसको लेकर बिहार की सियासत में सरगर्मी बढ़ गई है. खास तौर पर एनडीए खेमे में जहां इसको लेकर कयासों का बाजार गर्म है.  चिराग पासवान का केंद्र की राजनीति से बिहार के सियासी मैदान में सीधे तौर पर आना महागठबंधन के नेता तेजस्वी प्रसाद यादव के लिए भी एक नई सियासी चुनौती के तौर पर माना जा रहा है. चिराग पासवान किसी सामान्य सीट से लड़ेंगे. आखिर चिराग पासवान के बिहार विधानसभा चुनाव लड़ने को लेकर एलजेपीआर का यह फैसला बिहार की राजनीति की दृष्टि से कितना बड़ा है? क्या तेजस्वी यादव के लिए यह नया चैलेंज है या मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नई सरदर्दी?

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चिराग पासवान  बिहार में अपनी राजनीतिक शक्ति को और सशक्त करना चाहते हैं.वो भविष्य में बिहार का सीएम बनना चाहते हैं. चिराग पासवान के बिहार चुनाव लड़ने का फैसला मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीति और तेजस्वी यादव की पॉलिटिक्स, दोनों को प्रभावित करेगा. आने वाले समय में यह इस मायने में महत्वपूर्ण है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी उम्र और सियासी रूप से ढलान की ओर हैं. आने वाले समय में वह 2025 में एनडीए का चेहरा जरूर हैं, लेकिन इसके आगे की राजनीति में वह कितना सक्रिय रह पाएंगे यह देखने वाली बात होगी. ऐसे में चिराग पासवान की पार्टी को लगता है कि आगे एनडीए में एक फेस की दरकार होगी जो चिराग पासवान भर सकते हैं.

चिराग पासवान कह चुके हैं  बिहार मुझे पुकार रहा है. बिहार मेरी हमेशा से प्राथमिकता रही है और अगर पार्टी कहेगी तो मैं विधानसभा चुनाव लड़ूंगा. बतौर सांसद मेरा यह तीसरा कार्यकाल है,लेकिन अब लगता है कि मुझे बिहार में ही रहकर काम करना चाहिए. मेरा सपना है कि बिहार युवाओं को अपना प्रदेश छोड़कर बाहर जाना ना पड़े. मेरी पार्टी और मैंने यह इच्छा जताई है कि मैं विधानसभा चुनाव लड़ना चाहता हूं. चिराग पासवान की महत्वाकांक्षा बिहार का चेहरा बनने की आज की नहीं है. वह जब से 2013 से जब से राजनीति में आए हैं तब से ही उन्होंने बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट का नारा दिया था. वह लगातार युवाओं की बात भी करते रहे हैं ऐसे में वह आने वाले समय में तेजस्वी यादव के सामने एक युवा चेहरा होंगे.

बिहार में युवा नेतृत्व के तौर पर एकमात्र चेहरा तेजस्वी यादव का बड़ा कद दिखता है, क्योंकि उनके साथ लालू प्रसाद यादव की सियासत की विरासत भी है. जातिगत समीकरण भी फेवर करता है और एक बिहार के दो तिहाई मतदाताओं (मुस्लिम-यादव) पर उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है. लेकिन, सवाल यह है कि क्या चिराग पासवान तेजस्वी यादव के लिए चुनौती साबित हो सकते हैं? जाहिर तौर पर राजनीति में बदलते वक्त के साथ कई समीकरण भी बदलते हैं और उतार-चढ़ाव भी आते हैं. चिराग पासवान अगर चुनावी मैदान में आते हैं तो तेजस्वी यादव की चुनौती बढ़ जाएगी, क्योंकि अभी तक बिहार में युवा चेहरे के तौर पर तेजस्वी यादव के बाद एक प्रशांत किशोर दिखते हैं और अब चिराग पासवान भी होंगे.

सामान्य सीट से चुनाव लड़ने का फैसला भी बड़ा दांव माना जा रहा है. क्योंकि चिराग पासवान मोटे तौर पर जातिवादी राजनीति नहीं करते.प्रशांत किशोर भी चिराग पासवान के बारे में ऐसा ही विचार रखते हैं. चिराग पासवान युवा वर्ग में जातिगत दायरे से बाहर भी लोकप्रिय हैं और बिहार में जहां भी जाते हैं वहां उनको देखने-सुनने के लिए भीड़ उमड़ पड़ती है. नये जेनरेशन को वह इस मायने में पसंद हैं कि अपने भाषणों में उन्होंने कभी जातिवादी राजनीति करने की कोशिश नहीं की. अब जब उन्होंने सामान्य सीट से चुनाव लड़ने का फैसला किया है तो यह वह यह भी संदेश देने की कोशिश करते हैं कि वह सक्षम हैं और उनकी स्वीकार्यता सभी वर्गों में है.चिराग पासवान सामान्य सीट से चुनाव लड़कर ये संदेश देना चाहते हैं कि रिजर्व कैटेगरी की सीट को वह कमजोर तबके के नेता के लिए खाली छोड़ना चाहते हैं.वो ये संदेश देना चाहते हैं कि वो केवल दलितों के नेता नहीं हैं.सामान्य वर्ग की भी पसंद हैं.

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