बिहार विधानसभा स्थापना दिवस: ‘सदन में शोर नहीं, संवाद हो’, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने जनप्रतिनिधियों को दिया आत्ममंथन का मंत्र

Ritu Raj

सिटी पोस्ट लाइव
बिहार विधानसभा के स्थापना दिवस के ऐतिहासिक अवसर पर राजधानी पटना की सियासी फ़ज़ा गौरव और संकल्पों से सराबोर दिखी। इस खास मौके पर आयोजित “सशक्त विधायक–सशक्त लोकतंत्र” विषय पर बोलते हुए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने देश के गिरते संसदीय स्तर पर गहरी चिंता व्यक्त की और जनप्रतिनिधियों को उनकी संवैधानिक मर्यादाओं की याद दिलाई।

मर्यादा और गरिमा पर ‘दो टूक’
लोकसभा अध्यक्ष ने अपने संबोधन में सीधा और स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने कहा कि आज देश के विभिन्न सदनों में जिस तरह से हंगामा और शोर-शराबा बढ़ रहा है, उससे संसदीय गरिमा को ठेस पहुँच रही है। बिड़ला ने दो टूक शब्दों में कहा: “विधानसभाएं लोकतंत्र की वो पाठशालाएं हैं जहाँ से देश का नेतृत्व निकलता है। जनता बड़ी उम्मीदों के साथ अपने प्रतिनिधि को सदन भेजती है, इसलिए हंगामा करना समाधान नहीं है। अपनी बात रखने का सबसे सशक्त माध्यम संविधान की समझ और शालीन संवाद है।” उन्होंने विधायकों से अपील की कि वे सदन के भीतर जनता की भावनाओं का आदर करें और निजी विरोध के बजाय जनहित के मुद्दों पर संजीदगी से चर्चा करें।

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2026 तक डिजिटल होगा देश का लोकतंत्र
आधुनिक दौर की चुनौतियों और तकनीकी बदलावों पर चर्चा करते हुए ओम बिड़ला ने एक बड़ी घोषणा की। उन्होंने बताया कि 2026 के अंत तक देश की सभी विधानसभाओं का शत-प्रतिशत डिजिटाइजेशन पूरा कर लिया जाएगा। अब संसद और सभी राज्यों की विधानसभाओं की कार्यवाही एक ही साझा डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होगी। उन्होंने विधायकों को सलाह दी कि वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डिजिटल डेटा का उपयोग कर अपनी कार्यक्षमता को बढ़ाएं ताकि जनता के साथ संवाद अधिक पारदर्शी और प्रभावी हो सके।

बिहार: लोकतंत्र और विचारों की जननी
बिहार की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विरासत को नमन करते हुए ओम बिड़ला ने कहा कि यह वह धरती है जिसने दुनिया को लोकतंत्र और अहिंसा का पाठ पढ़ाया है। यहाँ से निकले आंदोलनों और विचारों ने समय-समय पर देश को नई दिशा दी है। इस कार्यक्रम का उद्घाटन दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ, जिसमें विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश और संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू समेत कई विशिष्ट अतिथि शामिल हुए। कुल मिलाकर, यह समारोह केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि लोकतंत्र को मजबूत करने और भविष्य की राजनीति को पारदर्शी बनाने के संकल्प का केंद्र बन गया।

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