क्या शादी से पहले संबंध बनाना अपराध है? सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ने हिलाकर रख दिया ‘लिव-इन’ कपल्स का भरोसा!..

Ritu Raj

सुप्रीम कोर्ट की इस हालिया टिप्पणी ने ‘सहमति बनाम धोखा’ के बीच की कानूनी रेखा को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भावनाओं के प्रवाह में आकर किसी पर भी आँख बंद करके भरोसा करना कानूनी और व्यक्तिगत दोनों ही दृष्टि से जोखिम भरा हो सकता है।

मामला क्या है?
मेट्रोमोनियल साइट के जरिए हुई एक मुलाकात जब शारीरिक संबंधों तक पहुँची, तो वह कानूनी विवाद में बदल गई। शादी का झांसा देकर दिल्ली और दुबई में शारीरिक संबंध बनाए गए और निजी वीडियो के जरिए महिला को धमकाया गया। आरोपी ने पहले से शादीशुदा होने की बात छिपाई और बाद में किसी और से विवाह कर लिया। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की पीठ ने कहा कि शादी की कानूनी मोहर लगने तक लड़का-लड़की एक-दूसरे के लिए ‘अजनबी’ ही होते हैं। इसलिए, बिना सोचे-समझे किसी के साथ विदेश यात्रा पर जाना या पूरी तरह भरोसा करना समझदारी नहीं है।

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शादी से पहले संबंध: कानून क्या कहता है?
भारत में बालिगों के बीच सहमति से बने शारीरिक संबंध अपने आप में अपराध नहीं हैं, लेकिन ‘सहमति’ का आधार क्या है, यह सजा तय करता है।

प्रावधानविवरण
धारा 69 (BNS)यदि कोई व्यक्ति शादी का झूठा वादा, पहचान छिपाकर या पद/प्रमोशन का लालच देकर संबंध बनाता है, तो यह दंडनीय है।
सजादोष सिद्ध होने पर 10 साल तक की कैद और जुर्माना हो सकता है।
सहमति का अभावकानून मानता है कि ऐसी स्थिति में ली गई सहमति ‘धोखे’ पर आधारित थी, इसलिए वह मान्य नहीं है।

भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69;
पुराने कानूनों (IPC) में ऐसे मामलों को अक्सर ‘रेप’ की धारा के तहत परखा जाता था, लेकिन नई भारतीय न्याय संहिता में इसके लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। यदि कोई व्यक्ति शादी का झूठा वादा, नौकरी या पदोन्नति का लालच देकर किसी महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाता है, तो उसे 10 साल तक की जेल और जुर्माना हो सकता है। बता दें कि ‘धोखा’ अगर आरोपी की नीयत शुरू से ही शादी करने की नहीं थी और उसने केवल शारीरिक शोषण के लिए वादा किया, तो वह अपराधी माना जाएगा।

कोर्ट की अहम नसीहत;
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में ‘सावधानी’ (Caution) को सर्वोपरि बताया है। पीठ ने संकेत दिया कि शादी से पहले किसी पर भी पूरी तरह निर्भर होना या निजी सीमाएं लांघना जोखिम भरा हो सकता है। यदि मामला पूरी तरह आपसी सहमति का है, तो लंबी अदालती कार्रवाई के बजाय समझौते की गुंजाइश देखी जा सकती है।

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