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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के शुरुआती दौर में ही कुछ सीटें ऐसी हैं, जिन पर न सिर्फ एनडीए (NDA) और महागठबंधन (INDIA Alliance) की पैनी नज़र है, बल्कि राजनीतिक पंडित भी इन पर भविष्यवाणी करने से बच रहे हैं। ये वे सीटें हैं जहाँ परिणाम चौंकाने वाले हो सकते हैं और राज्य की पूरी राजनीतिक दिशा तय कर सकते हैं।
मिथिलांचल क्षेत्र की 30 विधानसभा सीटों में से सात सीटें इस बार ‘HOT’ श्रेणी में आ गई हैं। इन सीटों की महत्ता इसलिए भी अधिक है क्योंकि यहाँ वर्तमान में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) का कब्ज़ा है। एनडीए इन सातों सीटों को हर हाल में अपनी झोली में डालना चाहती है, जबकि आइएनडीआइए (महागठबंधन) इन्हें किसी कीमत पर गंवाने को तैयार नहीं है।
वर्तमान में इन सात सीटों पर गैर-एनडीए काबिज
ये सात सीटें मिथिलांचल के तीन जिलों—दरभंगा, समस्तीपुर और मधुबनी—में फैली हैं। ये सीटें और उनके मौजूदा विधायक निम्नलिखित हैं:

2020 में लोजपा ने किया था ‘खेला’
इन सात सीटों के ‘हॉट’ बनने के पीछे 2020 के विधानसभा चुनाव का इतिहास है। मिथिलांचल की शेष 23 सीटों पर एनडीए का कब्जा है, लेकिन इन सात सीटों पर एनडीए को सफलता नहीं मिली थी, जिसकी मुख्य वजह थी लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) के उम्मीदवारों का चुनावी मैदान में होना।
2020 में, लोजपा ने मिथिलांचल की 30 में से 17 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे। इनमें से 10 सीटें तो एनडीए ने जीत लीं, लेकिन जिन सात सीटों पर आज सबकी नजर है, वहाँ लोजपा के प्रत्याशियों ने अच्छा-खासा वोट काटकर एनडीए (खासकर जदयू) के उम्मीदवारों को सीधा नुकसान पहुंचाया, जिससे राजद और माकपा के प्रत्याशी जीतने में कामयाब हो गए।
उदाहरण के लिए, दरभंगा ग्रामीण में लोजपा के उम्मीदवार ने 17,605 मत प्राप्त किए, जिससे जदयू की हार हुई। समस्तीपुर में सबसे अधिक नुकसान हुआ, जहाँ चार सीटें सीधे तौर पर लोजपा के कारण एनडीए के हाथ से निकल गईं। विभूतिपुर में लोजपा के चंद्रबली ठाकुर को 28,811 मत मिले, जबकि मोरवा में अभय कुमार सिंह ने 23,884 मत प्राप्त करके जदयू के उम्मीदवार को हराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हसनपुर में भी लोजपा के कारण ही तेजप्रताप यादव की राह आसान हुई थी।
2025 में चिराग की वापसी बनी नई रणनीति
इस बार स्थिति बिल्कुल अलग है। चिराग पासवान के नेतृत्व वाली लोजपा (रामविलास) अब एनडीए का हिस्सा है। ऐसे में एनडीए की रणनीति इन सातों सीटों पर अपनी पूरी ताकत झोंककर 2020 के नुकसान की भरपाई करना और इन सीटों को वापस जीतना है।
दूसरी ओर, महागठबंधन, जिसने इन सीटों पर जीत हासिल की थी, वह अपनी पकड़ ढीली नहीं करना चाहता। इस बात का भी इंतजार है कि क्या प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज इस चुनाव में 2020 वाली ‘वोटकटवा’ भूमिका निभाकर दोनों प्रमुख गठबंधनों के गणित को प्रभावित करती है या नहीं। इन सात सीटों के परिणाम तय करेंगे कि मिथिलांचल का झुकाव एनडीए की ओर है या महागठबंधन की ओर।