क्या राज्य सरकारें खुद निर्णय नहीं ले सकतीं? कांग्रेस और बीजेपी पर हाईकमान का दबाव…

Ritu Raj

कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद को लेकर सिद्धारमैया और डी.के. शिवकुमार के बीच टकराव ने कांग्रेस के सबसे मजबूत गढ़ को भी हिला दिया है। अब राज्य की राजनीति का फैसला बेंगलुरू नहीं, बल्कि दिल्ली के कांग्रेस आलाकमान की मेज पर होना तय माना जा रहा है। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर कांग्रेस और बीजेपी जैसी बड़ी पार्टियों को हर बार हाईकमान के इशारे पर ही क्यों चलना पड़ता है, और क्या राज्य सरकारें अपने दम पर निर्णय लेने में असमर्थ हैं?

राष्ट्रीय पार्टियों में एक अनजाना धागा चलता है: सत्ता, नियंत्रण और एकरूपता का। बीजेपी हो या कांग्रेस, दोनों मानती हैं कि अगर राज्य अपनी मर्जी से चले तो पार्टी की पहचान टूट सकती है। इसलिए मुख्यमंत्री, मंत्री, टिकट वितरण और रणनीति सबका अंतिम फैसला आलाकमान करता है। लोकप्रिय या अनुभवी नेता भी तभी प्रभावशाली होते हैं जब उनकी कुर्सी दिल्ली की मंजूरी से सुरक्षित हो। तकनीकी तौर पर राज्य सरकार स्वतंत्र है, लेकिन राजनीति संविधान से ज्यादा समीकरणों पर चलती है। कांग्रेस ने बगावत और टूट का दर्द भोगा, वहीं बीजेपी में हाईकमान सिर्फ पीएम या अध्यक्ष नहीं, बल्कि संगठन और RSS का संयुक्त निर्णय होता है। केंद्रीय नियंत्रण का मकसद साफ है कि राजनीति में एकरूपता बनाए रखना और किसी राज्य नेता को इतना शक्तिशाली न होने देना कि वह राष्ट्रीय नेतृत्व को चुनौती दे सके।

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लेकिन यह मॉडल हमेशा कारगर साबित नहीं होता। कई बार राज्य नेता ही जनता की नब्ज़ समझते हैं और स्थानीय मुद्दों को बेहतर जानते हैं। जब हाईकमान अपनी पसंद थोपता है, तो असंतोष बढ़ता है और चुनावी नतीजे भी प्रभावित हो सकते हैं। राजस्थान में अशोक गहलोत-पायलट टकराव, कर्नाटक में येदियुरप्पा की नाराजगी और मध्य प्रदेश में सिंधिया की बगावत जैसे उदाहरण हाईकमान मॉडल के भीतर बने संघर्षों को उजागर करते हैं। यही वह चुनौती है, जो राष्ट्रीय नेतृत्व और राज्य नेताओं के बीच संतुलन बनाए रखना हर समय मुश्किल बना देती है।

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