बिहार की सत्ता के शीर्ष पर काबिज नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फैसले ने जनता दल (यूनाइटेड) को हिलाकर रख दिया है। यह फैसला केवल एक पद का त्याग नहीं है, बल्कि पार्टी के भीतर एक गहरी दरार और भविष्य को लेकर अनिश्चितता का संकेत भी है। नीतीश कुमार का राज्यसभा जाने का फैसला ‘बंद कमरे’ की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसकी भनक सीनियर नेताओं तक को नहीं थी। अब सवाल यह है कि क्या निशांत कुमार उस बिखराव को रोक पाएंगे जो नीतीश के जाने से पैदा हुआ है? बिहार की राजनीति अब एक ऐसे मोड़ पर है जहाँ ‘नीतीश युग’ के बाद के भविष्य की तलाश शुरू हो गई है।
दो धड़ों में बंटी पार्टी;
पार्टी में इस समय दो स्पष्ट गुट नजर आ रहे हैं। जहाँ दिल्ली में सक्रिय नेता जैसे ललन सिंह और संजय झा इस फैसले को नीतीश की व्यक्तिगत मर्जी और अधिकार बता रहे हैं, वहीं बिहार में जमीन पर काम करने वाले विधायक और मंत्री इस बदलाव से मर्माहत हैं।
ललन सिंह का पक्ष: उनका कहना है कि नीतीश की इच्छा के विरुद्ध कोई फैसला नहीं हो सकता। मुख्यमंत्री कौन होगा, यह भी नीतीश ही तय करेंगे।
विधायकों की नाराजगी: बेनीपुर विधायक विनय चौधरी ने खुलकर कहा कि कोई भी विधायक इस फैसले से खुश नहीं है। उन्होंने पूछा कि आखिर तीन महीने में ऐसा क्या बदल गया कि उन्हें कुर्सी छोड़नी पड़ी?
आंसू और सन्नाटा;
शुक्रवार को ‘एक अणे मार्ग’ (मुख्यमंत्री आवास) पर हुई विधायक दल की बैठक किसी विदाई समारोह जैसी बोझिल रही। अशोक चौधरी की आंखों में आंसू दिखे, तो सबसे वरिष्ठ मंत्री बिजेंद्र यादव बिना कुछ बोले बैठक से जल्दी निकल गए। वहीं, लेशी सिंह और नीरज कुमार जैसे नेताओं ने इस फैसले पर हैरानी जताते हुए कहा कि कार्यकर्ता आहत हैं और यह स्पष्ट नहीं है कि नीतीश के बाद पार्टी को कौन संभालेगा।
जदयू के नए उत्तराधिकारी?
पार्टी की इस टूट को बचाने और विरासत को आगे बढ़ाने के लिए अब नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार का नाम सामने आया है। बैठक में संजय झा ने निशांत के पार्टी में शामिल होने का प्रस्ताव रखा, जिस पर विधायकों ने हाथ उठाकर सहमति जताई। हालांकि, नीतीश कुमार ने भावुक विधायकों को शांत करते हुए कहा, “विरोध मत करिए, मैं राज्यसभा जा रहा हूं लेकिन वहां से सब देखता रहूंगा।” इसके मंत्री श्रवण कुमार ने स्पष्ट कर दिया है कि अब युवा चेहरा निशांत कुमार ही जदयू का नेतृत्व करेंगे।