संसद के गलियारों में अक्सर यह आरोप गूंजता है कि “हमारा माइक बंद कर दिया गया।” लेकिन तकनीकी और प्रशासनिक हकीकत इससे कहीं अलग है। स्पीकर ओम बिरला के हालिया स्पष्टीकरण ने इस पर से पर्दा हटा दिया है।

लोकसभा अध्यक्ष की मेज पर कई गैजेट्स और पेपर्स होते हैं, लेकिन वहां माइक ऑन या ऑफ करने का कोई बटन नहीं होता। स्पीकर का काम केवल निर्देश देना है। वे सदन के ‘रेफरी’ की तरह होते हैं जो खेल के नियम तय करते हैं, लेकिन स्कोरबोर्ड (यानी साउंड सिस्टम) कोई और संभालता है। संसद के भीतर एक कंट्रोल रूम होता है, जिसे तकनीकी भाषा में ‘साउंड चैंबर’ कहा जाता है। यहां बैठने वाले लोग किसी पार्टी के कार्यकर्ता नहीं, बल्कि लोकसभा/राज्यसभा सचिवालय के स्थायी कर्मचारी होते हैं। उनके सामने एक विशाल पैनल होता है, जिसमें सदन की हर सीट के नंबर के अनुसार स्विच लगे होते हैं। दरअसल, हर सांसद का माइक उनकी अलॉट की गई सीट से ही लिंक होता है। यदि कोई सांसद अपनी सीट छोड़कर दूसरी बेंच पर जाकर चिल्लाता है, तो तकनीकी रूप से उनका माइक वहां काम नहीं करेगा।

माइक कब और क्यों बंद होता है?
माइक बंद होना कोई व्यक्तिगत रंजिश नहीं, बल्कि संसदीय नियमों (Rules of Procedure) का हिस्सा है। माइक तभी ‘लाइव’ होता है जब अध्यक्ष उस सांसद का नाम पुकारते हैं। बिना अनुमति के खड़े होने पर टेक्नीशियन माइक ऑन नहीं करते। शून्य काल (Zero Hour) या विशेष चर्चा के दौरान हर सांसद के लिए समय तय होता है (जैसे 3 मिनट)। समय समाप्त होते ही सिस्टम उसे ऑटोमैटिक या मैन्युअल रूप से डिस्कनेक्ट कर देता है। हालांकि, यदि कोई सांसद असंसदीय भाषा का प्रयोग करता है या स्पीकर के आदेश की अवहेलना करता है, तो अध्यक्ष के ‘Order’ कहते ही माइक काट दिया जाता है।