नए साल की शुरुआत में ही बिहार की राजनीति गर्म हो गई है। इस बार विवाद का केंद्र है बिजली की दरें, जो आम घरों की रसोई से लेकर दुकानदारों के कारोबार तक सीधे असर डाल सकती हैं। सत्ता और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि अगर प्रस्तावों को हरी झंडी मिल गई, तो 1 अप्रैल 2026 से प्रदेशवासियों को महंगी बिजली का सामना करना पड़ सकता है।
बिहार स्टेट पावर ट्रांसमिशन कंपनी, स्टेट लोड डिस्पैच सेंटर और बिहार ग्रिड कंपनी ने बिहार विद्युत नियामक आयोग के सामने अलग-अलग प्रस्ताव पेश किए हैं। इनमें छोटे दुकानदारों के फिक्स चार्ज में 50 रुपये की राहत देने के साथ-साथ प्रति यूनिट बिजली 35 पैसे बढ़ाने का सुझाव शामिल है। वहीं, आज पटना में होने वाली जनसुनवाई को सत्ता और विपक्ष दोनों एक पॉलिटिकल लिटमस टेस्ट के रूप में देख रहे हैं। जो नागरिक आज शामिल नहीं हो पाएंगे, उनके लिए 15 जनवरी को बेगूसराय, 19 जनवरी को गया और 5 फरवरी को पटना विद्युत भवन में सुनवाई के और मौके उपलब्ध होंगे। आयोग का कहना है कि फैसले से पहले हर तबके की राय सुनना जरूरी है, ताकि बाद में जनविरोधी आरोप न लगें। वर्तमान में ग्रामीण घरेलू उपभोक्ताओं को 125 यूनिट तक बिजली मुफ्त मिलती है। इसके बाद खपत बढ़ने पर 35 पैसे प्रति यूनिट अतिरिक्त देना होगा। वहीं, 100 यूनिट से कम बिजली खर्च करने वाले शहरी और ग्रामीण दुकानदार भी प्रस्तावित दरों से प्रभावित हो सकते हैं। व्यवसायिक उपभोक्ताओं के लिए 8.14 रुपये प्रति यूनिट की दर तय करने का प्रस्ताव है, जो छोटे व्यापारियों के लिए चिंता का विषय बन सकता है।
दूसरी ओर, साउथ और नॉर्थ बिहार डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी ने शहरी इलाकों में दो स्लैब को मिलाकर 7.77 रुपये प्रति यूनिट की दर लागू करने का सुझाव दिया है। इसके तहत 125 यूनिट फ्री बिजली के बाद हर यूनिट पर 1.18 रुपये की राहत मिल सकती है। इसे सरकार की शहरी वोट बैंक को साधने की रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है। आज आयोग के कोर्ट रूम में अध्यक्ष आमिर सुबहानी और अन्य अधिकारी जनता, कंपनियों और संगठनों की दलीलों को सुनेंगे। इसके बाद सभी तथ्यों की समीक्षा के बाद अंतिम फैसला लिया जाएगा, जो 1 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2027 तक लागू होगा। अब देखने वाली बात यह है कि यह फैसला जनता के पक्ष में होगा या महंगाई की आग में एक और चिंगारी जोड़ देगा।