टूटना तो दूर, और मजबूत हुए कुशवाहा! पटना आवास की इन तस्वीरों ने बिहार की राजनीति में मचाई खलबली…

Ritu Raj

बिहार की राजनीति में ‘खरमास’ के बाद उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के भविष्य को लेकर जो कयास लगाए जा रहे थे, वे अब फीके पड़ते नजर आ रहे हैं। यह छोटी सी मुलाकात महज शिष्टाचार नहीं, बल्कि कुशवाहा की एक बड़ी रणनीतिक जीत है। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि वे अपनी राजनीतिक जमीन को सुरक्षित रखना जानते हैं। अब देखना यह होगा कि क्या पार्टी के भीतर पूरी तरह शांति बहाल हो पाती है या आने वाले दिनों में कोई नया मोड़ देखने को मिलता है।

चाय पर चर्चा और एकजुटता का संदेश;
उपेंद्र कुशवाहा ने पटना स्थित अपने आवास पर पार्टी के दो कद्दावर विधायकों—माधव आनंद और आलोक कुमार सिंह—के साथ अनौपचारिक मुलाकात की। सोशल मीडिया पर साझा की गई इन तस्वीरों ने ‘पार्टी में टूट’ की खबरों को सिरे से खारिज कर दिया है। चाय की चुस्कियों के साथ हुई इस बातचीत ने विरोधियों को यह कड़ा संदेश दिया है कि कुशवाहा का अपने कुनबे पर नियंत्रण अब भी बरकरार है।

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‘खरमास’ की भविष्यवाणियां हुईं फेल;
पिछले कई हफ्तों से बिहार के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा गर्म थी कि खरमास खत्म होते ही कुशवाहा की पार्टी बिखर जाएगी। विरोधी खेमे को उम्मीद थी कि पार्टी के भीतर का असंतोष एक बड़ी बगावत का रूप लेगा। हालांकि, कुशवाहा ने समय रहते सक्रियता दिखाई और अपने प्रमुख साथियों को साथ बैठाकर तमाम अटकलों पर पूर्णविराम लगा दिया।

बागियों के सामने अब ‘करो या मरो’ की स्थिति;
कुशवाहा की इस रणनीतिक चाल ने पार्टी के भीतर मौजूद अन्य असंतुष्ट सुरों को बैकफुट पर धकेल दिया है।
सीमित विकल्प: जब मुख्य चेहरे नेतृत्व के साथ खड़े हैं, तो अन्य बागियों के लिए अलग रास्ता बनाना अब मुश्किल होगा।
अलगाव का डर: विश्लेषकों का मानना है कि अब बागी विधायकों को या तो कुशवाहा की शर्तों को मानना होगा या फिर पार्टी में अलग-थलग पड़ने के लिए तैयार रहना होगा।

भविष्य की राजनीति और मोलभाव;
पार्टी को बिखरने से बचाकर उपेंद्र कुशवाहा ने आगामी चुनावों के मद्देनजर अपनी ‘बार्गेनिंग पावर’ (मोलभाव की शक्ति) को बढ़ा लिया है। सत्ताधारी दल और विपक्ष, दोनों ही अब उनकी अगली चाल पर नजर गड़ाए हुए हैं।

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