62 साल बाद विदाई: जानें भारतीय वायुसेना में इसका इतिहास, अहम मिशन और अब कौन बनेगा इसका ‘उत्तराधिकारी’

Ritu Raj

सिटी पोस्ट लाइव
भारतीय वायुसेना (IAF) का पहला सुपरसोनिक लड़ाकू विमान मिग-21 (MiG-21) आखिरकार 62 वर्षों की लंबी और बहुमूल्य सेवा के बाद रिटायर हो गया है। सोवियत रूस द्वारा मात्र 40 साल की सेवा अवधि के लिए बेचा गया यह विमान भारतीय इंजीनियरों के लगातार अपग्रेडेशन और मेंटेनेंस के दम पर छह दशक से अधिक समय तक देश की सीमाओं की रक्षा करता रहा। 26 सितंबर को इसकी औपचारिक सेवानिवृत्ति हो गई।

भारतीय वायुसेना में 1963 में शामिल हुआ मिकोयान-गुरेविच (MiG-21) अपनी तेज रफ्तार और फुर्ती के लिए जाना जाता था। हजारों फीट की ऊंचाई से टारगेट पर मिसाइल दागकर पलक झपकते ही गायब हो जाने की इसकी क्षमता ने इसे कई महत्वपूर्ण मिशनों में अमूल्य बना दिया।

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मिग-21: भारतीय सेना में शामिल होने का सफर
मिग-21 को 1960 और 70 के दशक में अपनी तकनीकी बढ़त के कारण ‘गेम चेंजर’ माना जाता था। यह भारत का पहला सुपरसोनिक लड़ाकू विमान था और सभी मौसमों में काम करने की क्षमता रखता था। भारत ने रूस से यह विमान लगभग पौने दो सौ करोड़ रुपये की कीमत पर खरीदा था। वायुसेना को कुल 874 मिग-21 प्राप्त हुए थे, जिनमें से 600 का निर्माण भारत में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) द्वारा ही किया गया था।

शुरुआत में, 1963 में जब इसे शामिल किया गया, तब यह केवल वायु रक्षा लड़ाकू विमान था, जो दो के-13 मिसाइलों और साधारण इन्फ्रारेड होमिंग सिस्टम से लैस था। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद, इसकी मारक क्षमता बढ़ाने के लिए इसमें जीपी-9 गन पॉड लगाया गया, जिसमें 23 मिमी की गशा तोप फिट की गई, जिसने इसे पाकिस्तान के एफ-86 सेबर जैसे विमानों के मुकाबले खड़ा कर दिया।

अहम मिशन: जासूसी से लेकर कारगिल तक
मिग-21 ने देश की सेवा में कई अहम सैन्य अभियानों को सफलतापूर्वक अंजाम दिया:

  1. 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध: इन दोनों युद्धों में मिग-21 ने टोही (जासूसी) मिशनों में महत्वपूर्ण सहायता की, जिससे दुश्मन की स्थिति और गतिविधियों का सटीक पता लगाया जा सका।
  2. ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984): अमृतसर में हुए इस ऑपरेशन के दौरान मिग-21 का इस्तेमाल मुख्य रूप से हवाई निगरानी और ज़मीन पर तैनात सेना को समर्थन देने के लिए किया गया था।
  3. स्कार्दू टोही मिशन (1984-1987): पाकिस्तान के गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र में स्थित सामरिक रूप से महत्वपूर्ण स्कार्दू की घाटी में दुश्मन की गतिविधियों की निगरानी के लिए मिग-21 के कई टोही मिशन चलाए गए।
  4. कारगिल युद्ध (1999): कारगिल के बीडीए दर्रे पर मिग-21 ने फोटोग्राफिक रिकॉर्डिंग (FR) मिशन को अंजाम दिया। इसकी जासूसी से प्राप्त रणनीतिक जानकारी ने भारतीय सेना को युद्ध में निर्णायक लाभ दिलाया।
  5. ऑपरेशन सिंदूर: रिटायरमेंट से ठीक पहले भी यह विमान ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में पूरी तरह अलर्ट मोड में था और इसकी लड़ाकू रैकी जारी थी, जो स्ट्राइक के साथ-साथ जासूसी में भी इसके निरंतर महत्व को दर्शाता है।

मिग-21 की प्रमुख विशेषताएँ
मिग-21 की फुर्ती और मारक क्षमता ही इसकी पहचान थी:

  1. अधिकतम गति: यह 2,175 किमी प्रति घंटा की अधिकतम गति से उड़ान भर सकता था।
  2. सुपरसोनिक उड़ान: यह सुपरसोनिक गति में उड़ान भरने में सक्षम था, जो उस समय के अन्य विमानों की तुलना में काफी तेज थी।
  3. पेलोड क्षमता: इसकी पेलोड क्षमता लगभग 3,500 किलोग्राम थी और यह एयर-टू-एयर मिसाइल, बम तथा अन्य उपकरण ले जाने में सक्षम था।
  4. टोही क्षमता में अपग्रेड: जासूसी विमान के रूप में उपयोग करने के लिए इसमें टाइप 751 पैनोरमिक कैमरा समेत संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक उपकरण लगाए गए, जिससे यह उच्च गुणवत्ता की तस्वीरें लेकर खुफिया जानकारी एकत्र करने में सक्षम बना।

‘उड़ता ताबूत’ क्यों कहलाया?
40 साल की अनुमानित उम्र के मुकाबले 62 साल तक सेवा देने वाले इस विमान में लम्बे समय से कई तकनीकी, मेंटेनेंस और कुछ मानवीय कमियों के कारण दुर्घटनाएँ होती रहीं। अभी तक देश में मिग-21 की 490 से अधिक दुर्घटनाएँ दर्ज की गई हैं, जिनमें 200 से ज्यादा पायलटों की जान चली गई है। इन लगातार हो रही दुर्घटनाओं के कारण इसे दुखद रूप से “उड़ता ताबूत” और “विडो मेकर” कहा जाने लगा था। तेज रफ्तार के दौरान पायलट के लिए कम विजिबिलिटी इसकी एक बड़ी तकनीकी कमी थी।

मिग-21 का स्थान कौन लेगा?

मिग-21 की सेवानिवृत्ति के बाद, भारतीय वायुसेना इसकी जगह स्वदेशी रूप से निर्मित लड़ाकू विमानों से भरेगी।

  1. उत्तराधिकारी: मिग-21 की जगह मुख्य रूप से तेजस एमके-1ए लड़ाकू विमान लेंगे।
  2. खरीद अनुबंध: रक्षा मंत्रालय ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) से 97 तेजस एमके-1ए लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए 62,370 करोड़ रुपये का अनुबंध किया है।
  3. स्वदेशी विशेषताएँ: तेजस एमके-1ए विमानों में ‘स्वयम् रक्षा कवच’ जैसे आधुनिक फीचर होंगे। इसमें 64 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी पुर्जे लगे हैं और 67 नए स्वदेशी आइटम जोड़े गए हैं।
  4. भूमिका: तेजस एक मल्टी-रोल फाइटर है, जो एयर डिफेंस, समुद्री निगरानी और स्ट्राइक मिशन में इस्तेमाल किया जा सकता है।

वर्तमान में वायुसेना के पास केवल 31 स्क्वाड्रन बचे हैं, जबकि अधिकृत संख्या 42 स्क्वाड्रन की है। तेजस एमके-1ए की डिलीवरी 2027-28 से शुरू होने के बाद वायुसेना की लड़ाकू क्षमता में महत्वपूर्ण वृद्धि होने की उम्मीद है।

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