सरकारी नीतियां फेल, नन्हीं हथेलियों पर सपने नहीं, जान रख कर स्कूल जाते हैं बच्चे

50 साल से पुल की मांग कर रहे ग्रामीण, कब सुनेगी सरकार?

Rahul
By Rahul
  • स्कूल जाने के लिए नाव का सहारा, खतरे के साए में शिक्षा

सिटी पोस्ट लाइव

सहरसा। सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति किसी से छिपी नहीं है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब स्कूल जाने का रास्ता ही खतरनाक हो, तो बच्चे कैसे पढ़ाई करें? सहरसा जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो प्रशासन पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। यहां के बच्चे हर दिन जोखिम भरा सफर तय कर स्कूल पहुंचते हैं, क्योंकि उनके गांव तक जाने के लिए कोई पुल नहीं है। मजबूरी में वे छोटी नाव का सहारा लेकर ढेमरा नदी पार करते हैं और अपनी जान जोखिम में डालकर शिक्षा हासिल करने की कोशिश करते हैं।

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50 साल से पुल की मांग, अब तक अधूरी

यह मामला सहरसा जिला मुख्यालय से 7 किलोमीटर दूर मुरली बसंतपुर पंचायत के मुरली भरना गांव का है। यहां के ग्रामीण पिछले 50 साल से ढेमरा नदी पर पुल बनाने की मांग कर रहे हैं, लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं निकला। इस कारण इलाके के बच्चों के लिए स्कूल जाना किसी चुनौती से कम नहीं है। पश्चिमी क्षेत्र में उत्क्रमित मध्य विद्यालय और नदी के दूसरी ओर नवसृजित विद्यालय मुरली भरना गुलाम रसूल टोला स्थित है, जहां जाने के लिए बच्चों को नदी पार करनी पड़ती है।

हर दिन मौत का खतरा

बच्चे बताते हैं कि कई बार नाव नदी में पलट चुकी है। सौभाग्यवश, पानी कम होने के कारण कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ, लेकिन डर हमेशा बना रहता है। छात्रा नरगिस प्रवीण का कहना है, “स्कूल जाने में बहुत डर लगता है, लेकिन कोई और साधन नहीं है, इसलिए नाव से जाना पड़ता है।” वहीं, छात्रा सलमा परवीन ने बताया, “हर दिन हमें नाव से नदी पार करनी पड़ती है, डर तो हमेशा बना रहता है।” छात्र मोहम्मद आसिफ ने कहा, “दो दिन पहले नाव बीच नदी में फंस गई थी। हम चिल्लाने लगे, तब जाकर गांव के लोग आए और हमें बचाया।” इसी तरह, छात्र मोहम्मद सलमान ने भी पुल की जरूरत पर जोर देते हुए कहा, “अगर पुल होता, तो हमें रोज़ इतना डर नहीं लगता।”

सरकार के दावों पर सवाल

जहां एक तरफ सरकार विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही है, सड़कों और पुलों के निर्माण की योजनाएं बनाई जा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ इस गांव के बच्चों को हर दिन जान हथेली पर रखकर स्कूल जाना पड़ता है। आखिर कब तक ये नन्हे बच्चे जोखिम भरा सफर तय करते रहेंगे? कब प्रशासन उनकी आवाज़ सुनेगा? यह एक गंभीर सवाल है, जिसका जवाब सरकार को देना ही होगा।

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