नीतीश कुमार के दसवीं बार मुख्यमंत्री बने है। 26 मंत्रियों के साथ शपथ ग्रहण के बाद एक बार फिर यह सवाल चर्चा में है, कि आखिर एक सरकार में अधिकतम कितने मंत्री हो सकते हैं। क्या मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री अपनी इच्छा से जितने चाहें उतने चेहरों को मंत्रिमंडल में शामिल कर सकते हैं, या फिर इसके पीछे संविधान में तय सख्त नियम काम करते हैं? दरअसल, दोनों(केंद्र और राज्यों) में ही मंत्रियों की संख्या एक तय सीमा के भीतर रखी जाती है। इसी संवैधानिक फॉर्मूले के आधार पर कैबिनेट विस्तार के समय मंत्री पदों के बढ़ने या घटने का निर्णय लिया जाता है।
किसी भी सरकार में मंत्रियों की संख्या तय करने का आधार 91वां संविधान संशोधन है। इसके अनुसार केंद्र और राज्यों में मंत्रियों की अधिकतम संख्या सीधे तौर पर संबंधित सदन की कुल सदस्य संख्या पर निर्भर करती है। यानी केंद्र में लोकसभा की संख्या के आधार पर और राज्यों में उनकी विधानसभा की ताकत के मुताबिक ही कैबिनेट का आकार तय किया जाता है। वहीं, पहले कई राज्यों और केंद्र में मंत्री पद अक्सर राजनीतिक संतुलन साधने के लिए बांट दिए जाते थे, जिससे कैबिनेट जरूरत से अधिक फैल जाती थी। लेकिन 91वें संशोधन के बाद यह स्पष्ट कर दिया गया कि दोनों ही स्तर पर मंत्रियों की संख्या सदन की कुल सदस्य संख्या के अधिकतम 15 प्रतिशत तक ही रखी जा सकती है। छोटे राज्यों के लिए एक विशेष प्रावधान भी है, जिसके तहत उनके मंत्रिमंडल में कम से कम 12 मंत्री रखे जा सकते हैं, भले ही 15 प्रतिशत का अनुपात कम संख्या दे रहा हो।
दरअसल, मंत्रियों की नियुक्ति पूरी तरह प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के राजनीतिक संतुलन, अनुभव, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और व्यक्तिगत भरोसे पर निर्भर करती है। लेकिन संवैधानिक सीमा तय हो जाने से अब मंत्रिमंडल का आकार मनमाने ढंग से नहीं बढ़ाया जा सकता। यही वजह है कि सीमित पदों में वही चेहरे शामिल किए जाते हैं, जिनसे सरकार को प्रशासनिक दक्षता, राजनीतिक मजबूती और सुचारू कामकाज की उम्मीद होती है।