कांग्रेस के पूर्व वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री शकील अहमद ने पार्टी छोड़ने के बाद राहुल गांधी और कांग्रेस के आंतरिक ढांचे पर तीखे हमले किए। उन्होंने मुख्य रूप से आरोप लगाए कि कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र नाम की कोई चीज नहीं बची है। राहुल गांधी जो फैसला करते हैं, वही अंतिम होता है। राहुल गांधी वरिष्ठ नेताओं (जिनकी अपनी पहचान और जनाधार है) के साथ असहज महसूस करते हैं और उन्हें साइडलाइन करना चाहते हैं। उनकी जगह युवा या वफादार नेताओं (जैसे यूथ कांग्रेस से) को आगे बढ़ाने की कोशिश हो रही है। राहुल गांधी में नेहरू-गांधी परिवार के कारण श्रेष्ठता भाव है, और वे डरपोक (insecure), तानाशाही प्रवृत्ति वाले तथा असुरक्षित नेता हैं, जो मजबूत वरिष्ठ नेताओं से डरते हैं। पार्टी में सिर्फ वही लोग टिके हैं जो उनकी तारीफ करते हैं।

शकील अहमद ने यह भी खुलासा किया कि कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव में वे शशि थरूर को वोट देना चाहते थे, लेकिन राहुल और सोनिया गांधी के वफादारों के दबाव में अपनी मर्जी के खिलाफ मल्लिकार्जुन खड़गे को वोट दिया। इसी संदर्भ में जब शशि थरूर से शकील अहमद के इन बयानों पर प्रतिक्रिया मांगी गई, तो उन्होंने काफी संयमित और सतर्क रवैया अपनाया। थरूर ने कहा है कि “मैं हर किसी के बयानों पर कमेंट नहीं कर सकता। वहीं, अगर शकील साहब ने यह कहा है, तो उनसे ही बात करें, वे खुद बता सकते हैं। आगे कहा कि मुझे नहीं लगता कि ऐसे मुद्दों पर पब्लिक में चर्चा करना सही है।”
थरूर ने स्पष्ट रूप से किसी भी आलोचना या समर्थन से इनकार कर दिया और पार्टी के आंतरिक मामलों को सार्वजनिक मंच पर न लाने की वकालत की। यह उनका लगातार का रुख रहा है, जहां वे पार्टी की आलोचना से बचते हुए भी अपनी स्वतंत्र छवि बनाए रखते हैं। हालांकि, यह विवाद कांग्रेस के भीतर बढ़ते असंतोष को दर्शाता है, खासकर बिहार चुनावों के बाद पार्टी से कई नेताओं के अलग होने के संदर्भ में। बीजेपी ने इसे तुरंत भुनाया और राहुल गांधी तथा कांग्रेस पर हमला बोला, इसे पार्टी में “बगावत की शुरुआत” करार दिया। हालांकि, थरूर ने खुद को इससे अलग रखा और कोई विवाद बढ़ाने से परहेज किया। कुल मिलाकर, थरूर का जवाब सावधानीपूर्ण था, जो पार्टी की एकजुटता बनाए रखने की कोशिश को दिखाता है, जबकि शकील के आरोप कांग्रेस की आंतरिक चुनौतियों को उजागर कर रहे हैं।