सिटी पोस्ट लाइव
बिहार विधानसभा के स्थापना दिवस समारोह के अवसर पर केंद्रीय संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने भारतीय संसदीय व्यवस्था और जनप्रतिनिधियों के सामने आने वाली चुनौतियों पर खुलकर चर्चा की। उन्होंने अपने अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि भारत में एक सांसद या विधायक की जिम्मेदारी दुनिया के विकसित देशों की तुलना में कहीं अधिक जटिल और व्यापक है।
भारत बनाम इंग्लैंड: जिम्मेदारी का बड़ा अंतर
सदन को संबोधित करते हुए रिजिजू ने इंग्लैंड के अपने एक संसदीय दौरे का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि भारत और इंग्लैंड की संसदीय व्यवस्था में जमीन-आसमान का अंतर है। उनके अनुसार:
जनसंख्या का बोझ: इंग्लैंड में एक सांसद औसतन 90 हजार लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि भारत में एक सांसद करीब 25 लाख लोगों की उम्मीदों का केंद्र होता है।
काम का स्वरूप: इंग्लैंड में सांसद मुख्य रूप से नीतियों और कानूनों (Policy making) पर चर्चा करते हैं। इसके विपरीत, भारत में जनप्रतिनिधियों को जनता की छोटी-मोटी और ‘अजीब’ समस्याओं से भी जूझना पड़ता है।
सिफारिशी संस्कृति: रिजिजू ने चुटकी लेते हुए कहा कि भारत में जेल से बेल दिलाने, अस्पताल में बेड दिलाने, स्कूल एडमिशन से लेकर नाली-गली और बिजली तक के लिए लोग सांसद-विधायक के पास आते हैं, जबकि विदेशों में ऐसी समस्याओं के लिए जनप्रतिनिधियों के पास जाने का चलन नहीं है।
बिहार की धरती और वक्ताओं की प्रशंसा
रिजिजू ने बिहार को ज्ञान की भूमि बताते हुए कहा कि भगवान बुद्ध ने यहीं से शांति का संदेश दिया था। उन्होंने बिहार के विधायकों की सराहना करते हुए कहा, “बिहारी होने पर गर्व करें। बिहार के लोग बहुत अच्छे वक्ता होते हैं, जब वे सदन में बोलते हैं तो बोरियत नहीं होती।” उन्होंने बिहार विधान परिषद के ‘डिजिटल’ और ‘लाइव’ होने की भी तारीफ की।
मर्यादा और नियमों पर नसीहत
संसदीय कार्यमंत्री ने सदस्यों को नसीहत दी कि सदन की गरिमा बनाए रखने के लिए नियमों का ज्ञान होना अनिवार्य है। विपक्ष की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि बिना नियमों को समझे अपनी बात रखना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए सही नहीं है। वहीं, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने भी जोर दिया कि सदन में शोर-शराबे की जगह संवैधानिक चर्चा होनी चाहिए, क्योंकि विधानसभाएं ही देश के भविष्य का नेतृत्व तैयार करती हैं।