बिहार चुनाव में मुस्लिमों से मोहब्बत, टिकट में बेरुखी: जानें कौन सी पार्टी कितनी ‘दरियादिल’ है!…

Ritu Raj

बिहार में अगले महीने होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले मुस्लिम वोटरों पर सियासी नजरें टिक गई हैं। राज्य की 17.7 प्रतिशत आबादी वाले मुस्लिम वोटर लगभग 50 से 70 सीटों पर निर्णायक साबित हो सकते हैं, लेकिन सवाल यह है कि विधानसभा में उनका वास्तविक प्रतिनिधित्व कितना है। वर्तमान में मुस्लिम विधायकों की संख्या 8 प्रतिशत से भी कम रह गई है, जबकि राजनीतिक दलों ने इस बार करीब 60 मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं। 2023 की जातिगत गणना के अनुसार बिहार में मुसलमानों की कुल संख्या 2.30 करोड़ है, लेकिन लालू और नीतीश के शुरुआती दौर की तुलना में उनका विधानसभा में प्रतिनिधित्व आधा रह गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2000 से बिहार विधानसभा में मुस्लिम विधायकों की संख्या में लगातार गिरावट देखी गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह गिरावट जनसंख्या अनुपात के कारण नहीं, बल्कि पार्टियों की टिकट बंटवारे की नीतियों में बदलाव के कारण हुई है। इस बार के चुनाव में भी मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में गैर-मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिए जाने की जानकारी सामने आई है। वहीं, 1990 के दशक में राजद और जदयू गठबंधन ने सामाजिक न्याय और राजनीति में मजबूती दी थी, जिससे मुस्लिम समुदाय को विधानसभा में पर्याप्त प्रतिनिधित्व और पहचान मिली। लेकिन पिछले एक दशक में NDA-JDU गठबंधन और बदलते राजनीतिक समीकरणों ने मुस्लिम प्रतिनिधित्व को सीमित कर दिया है। साल 2020 के विधानसभा चुनाव में 243 सीटों में से केवल 19 मुस्लिम उम्मीदवार ही जीत सके। इनमें 8 राजद के, 5 एआईएमएम के, 4 कांग्रेस के, 1 बीएसपी और 1 सीपीआई(एमएल) के थे। इस चुनाव में मुस्लिमों की हिस्सेदारी 7.81 प्रतिशत रही। उस चुनाव में जदयू ने 11 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था, लेकिन सभी को हार का सामना करना पड़ा। पिछले चुनावों पर नजर डालें तो साल 2015 में विधानसभा में 24 मुस्लिम विधायक पहुंचे थे, जिनमें 12 राजद, 6 कांग्रेस, 5 जदयू और 1 सीपीआई(एमएल) का प्रतिनिधित्व था। यह आंकड़ा दिखाता है कि पिछले कुछ दशक में मुस्लिम प्रतिनिधित्व लगातार घटा है, जबकि उनकी आबादी में कोई बड़ी गिरावट नहीं हुई। विश्लेषकों का मानना है कि पार्टियों की टिकट वितरण नीतियों और गठबंधन समीकरणों ने मुस्लिम प्रतिनिधित्व को प्रभावित किया है, और यह बिहार की राजनीतिक तस्वीर में अब भी अहम भूमिका निभाने वाले मुस्लिम वोटरों के बीच असंतोष पैदा कर सकता है।

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मुस्लिम उम्मीदवारों का गणित इस चुनाव में:
राजद: 143 सीटों में 18 मुस्लिम उम्मीदवार (2020: 18, 8 जीत)।
कांग्रेस: 10 मुस्लिम उम्मीदवार (2020: 8, 4 जीत)।
सीपीआई(एमएल): 2 मुस्लिम उम्मीदवार (2020: 3, 1 जीत)।
वीआईपी: 15 सीटों पर कोई मुस्लिम उम्मीदवार नहीं (2020: 2, दोनों हार)।
जदयू: 101 सीटों में 4 मुस्लिम उम्मीदवार (2020: 11, कोई नहीं जीता)।
एलोजपा: 29 सीटों में 1 मुस्लिम उम्मीदवार (2020: 7, कोई नहीं जीता)।
एआईएमआईएम (औवैसी): 25 सीटों में 23 मुस्लिम उम्मीदवार (2024: 20, 5 जीत)।
बसपा: 4 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार।

गौरतलब है कि अधिकांश बड़े दलों ने मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या सीमित रखी है, जबकि एआईएमआईएम ने मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में सबसे अधिक प्रतिनिधित्व दिया है। यह चुनाव मुस्लिम वोटर की भूमिका को देखते हुए सियासी समीकरणों में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। साल 1985 में मुस्लिमों की विधानसभा में हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से अधिक थी, जब 324 सीटों पर हुए चुनाव में 34 मुस्लिम विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। बिहार की राजनीति में मुस्लिम समुदाय की भूमिका हमेशा अहम रही है, खासकर 50 से 70 सीटों पर जहां उनका वोट निर्णायक साबित होता है। राजनीतिक दल अक्सर चुनाव में मुस्लिम वोटरों का भरोसा जीतने के लिए वादे करते हैं, लेकिन सत्ता में हिस्सेदारी और टिकट वितरण के समय कंजूसी दिखाई देती है। यह समीकरण इस बार के विधानसभा चुनाव में भी महत्वपूर्ण रहेगा और मुस्लिम वोटर का असर निर्णायक हो सकता है।

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