PK और RCP के बाद शिवदीप लांडे और IP गुप्ता की बिहार चुनाव में एंट्री का असर.

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Bihar: चुनावी चौसर पर दांव आजमाने आए नए मोहरे,

सिटी पोस्ट लाइव : बिहार विधान सभा चुनाव में नये चार राजनीतिक दल मैदान में उतरने वाले हैं. वैसे तो अबतक बिहार में महागठबंधन और एनडीए के बीच सीधी लड़ाई रही है.केवल 25 से 30 फीसदी मतदाता विकल्प की तलाश में हमेशा रहे हैं.इन्हीं लोगों के बल पर ये चार पार्टियाँ चुनावी समर में उतरने जा रही हैं.

जसुपा: 02 अक्टूबर, 2024 को चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने जसुपा का गठन किया. पार्टी सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी और जनसंख्या के अनुपात में विभिन्न समाज-वर्ग को टिकट मिलना है.

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आसा: पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह ने 31 अक्टूबर, 2024 को आसा का गठन किया. 140 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी है. सात प्रतिशत की जनसंख्या वाले कुर्मी-कुशवाहा का आसरा है.

हिंद सेना: सितंबर, 2024 में शिवदीप वामनराव लांडे ने आईजी के पद से त्यागपत्र दिया था. 08 अप्रैल, 2025 को उन्होंने हिंद सेना के गठन की घोषणा की. पार्टी सभी सीटों पर लड़ेगी और लांडे भी प्रत्याशी होंगे.

आईआईपी: कांग्रेस से त्यागपत्र देकर अखिल भारतीय पान महासंघ के अध्यक्ष इंजीनियर आईपी गुप्ता ने 13 अप्रैल को आईआईपी का गठन किया. सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुके हैं.

जातीय और क्षेत्रीय आधार पर दलों के बनने-बिगड़ने की परंपरा प्राय: हर चुनाव में रही है, लेकिन इस बार जोर-जोश कुछ अधिक ही है. बहरहाल नवगठित दलों में एकमात्र जन सुराज पार्टी (जसुपा) ही  दमदार प्रतीत हो रही है.विधानसभा की चार सीटों पर हुए उपचुनाव में 10 प्रतिशत मत पाकर उसने इसका आभास भी कराया है. उससे पहले रूपौली के उपचुनाव में निर्दलीय शंकर प्रसाद की जीत में उसकी रणनीति का बड़ा योगदान रहा है. शेष तीनों दल (आसा, हिंद सेना और आईआईपी) भी उसी की तरह प्रभावी हों, इस पर संशय है.

2020 में 0.3 प्रतिशत वोट पाने वाली पुष्पम प्रिया की प्लूरल्स पार्टी इसका प्रमाण है. वह जिन 102 सीटों पर मैदान में थी, उनमें से मात्र तीन में तीसरे स्थान पर रही. तब 212 पार्टियां मैदान में थीं. आमने-सामने के गठबंधन (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और महागठबंधन) को 74.49 प्रतिशत मत के साथ 235 सीटें मिली थीं.

हिंद सेना का गठन करने वाले महाराष्ट्र के मूल निवासी शिवदीप लांडे (Shivdeep Lande) पर तो पहले से ही बाहरी का ठप्पा लगा हुआ है. बचे आरसीपी सिंह के लिए 2005 का दृष्टांत उचित होगा. तब रामविलास पासवान के साथ मिलकर रंजन यादव ने राजद को काफी नुकसान पहुंचाया था.उससे पहले तक वे लालू के विश्वस्तों में हुआ करते थे. संभव है कि आरसीपी सिंह भी जदयू के लिए ऐसी मंशा रखते हों, लेकिन इसके लिए उन्हें विरोधी गठबंधन के साथ समन्वय बनाना होगा. उसकी संभावना नहीं के बराबर है.

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