सिटी पोस्ट लाइव
पटना। बिहार में आगामी चुनावों के मद्देनजर कांग्रेस ने राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और महागठबंधन के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है। यह निर्णय कल रात दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय इंदिरा भवन में हुई महत्वपूर्ण बैठक के बाद लिया गया। बैठक में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और बिहार कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं ने भाग लिया। हालांकि, गठबंधन के तहत मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार को लेकर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। इस पर आगे विचार-विमर्श कर निर्णय लिया जाएगा।
कन्हैया कुमार का भविष्य अनिश्चित
इस राजनीतिक घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि बिहार में कांग्रेस के प्रमुख चेहरे के रूप में उभरे कन्हैया कुमार का अब क्या होगा? जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष और एनएसयूआई के राष्ट्रीय प्रभारी कन्हैया कुमार को कांग्रेस ने बिहार में राजनीति में आक्रामक रूप से उतारा था। उन्हें जनता के बीच लोकप्रिय बनाने के लिए पार्टी ने विशेष प्रयास किए थे। लेकिन राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव कन्हैया कुमार के उभरते कद से असहज नजर आ रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लालू प्रसाद यादव, कन्हैया कुमार को तेजस्वी यादव के लिए संभावित चुनौती के रूप में देखते हैं। इसकी एक प्रमुख वजह यह है कि कन्हैया उच्च शिक्षित नेता हैं और उनके समर्थकों में युवाओं, दलितों और अल्पसंख्यकों की अच्छी-खासी संख्या है। दूसरी ओर, तेजस्वी यादव की शैक्षणिक योग्यता को लेकर बीजेपी और जदयू लगातार हमलावर रहते हैं। ऐसे में कांग्रेस द्वारा कन्हैया कुमार को बिहार की राजनीति में आगे बढ़ाने से राजद की अंदरूनी राजनीति पर असर पड़ सकता है।
अब जब कांग्रेस ने राजद के साथ गठबंधन करने का फैसला कर लिया है, तो सवाल उठता है कि क्या पार्टी कन्हैया कुमार को बिहार से चुनाव लड़ाएगी या फिर उन्हें वापस दिल्ली भेज दिया जाएगा? कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, राजद किसी भी हालत में न तो कन्हैया कुमार को आगे बढ़ता देखना चाहता है और न ही पप्पू यादव को गठबंधन में शामिल करने के पक्ष में है।

बैठक में क्या हुआ?
बैठक के दौरान बिहार कांग्रेस प्रभारी कृष्णा अल्लावरु ने मीडिया को संबोधित किया और राजद के साथ चुनावी गठबंधन की घोषणा की। उनके साथ बिहार कांग्रेस के नवनियुक्त अध्यक्ष राजेश कुमार और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह भी मौजूद थे। अखिलेश प्रसाद सिंह की इस बैठक में उपस्थिति को महज संयोग नहीं माना जा रहा है। इससे साफ संकेत मिलते हैं कि कांग्रेस के अंदर वह अभी भी एक मजबूत स्थिति में बने हुए हैं।
बैठक के दौरान जब कृष्णा अल्लावरु से यह सवाल पूछा गया कि कांग्रेस समर्थक निर्दलीय सांसद पप्पू यादव को बैठक में क्यों नहीं बुलाया गया, तो उन्होंने इस पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया। उन्होंने केवल इतना कहा कि गठबंधन के दलों के साथ बातचीत करके आगे की रणनीति तय की जाएगी। इससे यह साफ हो गया कि कांग्रेस अब पूरी तरह से राजद के दबाव में आ गई है और लालू प्रसाद यादव की शर्तों पर ही गठबंधन आगे बढ़ेगा।
कांग्रेस का अगला कदम
मल्लिकार्जुन खरगे ने बैठक के दौरान बिहार कांग्रेस के नेताओं को स्पष्ट निर्देश दिया कि वे सिर्फ मुख्यालय में बैठने की बजाय जमीनी स्तर पर काम करें। उन्होंने कहा कि अगर पार्टी को बिहार में जीत हासिल करनी है, तो नेताओं को जनता के बीच जाकर संवाद करना होगा और उनकी समस्याओं को समझना होगा।
राहुल गांधी ने भी इस दौरान पार्टी नेताओं से कहा कि युवाओं के पलायन, बेरोजगारी, अपराध और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया जाए। उन्होंने जोर देकर कहा कि कांग्रेस नेताओं को इन मुद्दों पर हर मंच पर खुलकर अपनी बात रखनी चाहिए। उन्होंने यह भी अपील की कि सभी नेता आपसी मतभेद भुलाकर संगठन को मजबूत करने पर ध्यान दें और चुनावी तैयारियों में जुट जाएं।
तेजस्वी की उम्मीदवारी पर मतभेद?
बैठक के दौरान कांग्रेस ने मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार को लेकर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया। जब कृष्णा अल्लावरु से यह सवाल पूछा गया कि क्या तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जाएगा, तो उन्होंने स्पष्ट जवाब देने से बचते हुए कहा कि इस पर गठबंधन के सभी दल मिलकर चर्चा करेंगे।
यह कांग्रेस का एक बड़ा रणनीतिक बदलाव माना जा रहा है क्योंकि राजद पहले ही तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर चुका है। लालू प्रसाद यादव भी कई बार सार्वजनिक मंचों से कह चुके हैं कि कोई भी ताकत तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनने से नहीं रोक सकती। ऐसे में कांग्रेस का यह रुख राजद के लिए चिंता का विषय बन सकता है।
बैठक में कौन-कौन शामिल था?
इस महत्वपूर्ण बैठक में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता केसी वेणुगोपाल, मीरा कुमार, तारिक अनवर, रंजीत रंजन, कृष्णा अल्लावरु, राजेश कुमार, अखिलेश प्रसाद सिंह, शकील अहमद, मदन मोहन झा समेत कई अन्य बड़े नेता शामिल थे। इसके अलावा, बिहार कांग्रेस के कई विधायक और वरिष्ठ नेता भी बैठक का हिस्सा बने।
आगे क्या?
अब जब कांग्रेस ने राजद के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया है, तो कन्हैया कुमार के भविष्य को लेकर सस्पेंस बना हुआ है। क्या कांग्रेस उन्हें बिहार से चुनाव लड़ाएगी, या फिर दिल्ली में कोई नई जिम्मेदारी सौंपेगी?
इसके अलावा, तेजस्वी यादव की मुख्यमंत्री पद की दावेदारी को लेकर भी कांग्रेस और राजद के बीच मतभेद उभर सकते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि गठबंधन कितनी मजबूती से आगे बढ़ता है और कांग्रेस किस तरह से अपनी चुनावी रणनीति को आगे बढ़ाती है।