सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों की समस्या और उनसे होने वाली मौतों पर बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अब इंसानी जान की कीमत और पशु प्रेम के बीच जवाबदेही तय करने का वक्त आ गया है।
मुआवजे और जवाबदेही पर सख्त रुख;
अदालत ने साफ कहा कि आवारा कुत्तों के हमले में होने वाली हर मौत या चोट के लिए राज्य सरकारें जिम्मेदार होंगी।
भारी जुर्माना: कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर प्रशासन आवारा कुत्तों के प्रबंधन में विफल रहता है, तो राज्यों पर भारी मुआवजा लगाया जाएगा।
डॉग लवर्स की जिम्मेदारी: कोर्ट ने उन लोगों पर भी सवाल उठाए जो कुत्तों को खुले में खाना खिलाते हैं। कोर्ट ने कहा कि अगर आप कुत्तों को खिलाते हैं, तो उनकी जिम्मेदारी भी लें। उन्हें अपने घर ले जाएं, उन्हें सड़कों पर लोगों को काटने या पीछा करने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता।
“इंसान बनाम जानवर” का तर्क;
– मानवीय संवेदना: कोर्ट ने पूछा कि क्या पशु प्रेमियों के जज्बात सिर्फ कुत्तों के लिए हैं, इंसानों के लिए नहीं? एक 9 साल के बच्चे की मौत का उदाहरण देते हुए कोर्ट ने पूछा कि ऐसी मौतों का जिम्मेदार किसे माना जाए।
– पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem): वकील विकास सिंह ने तर्क दिया कि यह मामला केवल कुत्तों का नहीं बल्कि ‘इंसान बनाम जानवर’ का है। उन्होंने सांप और बंदरों के काटने का उदाहरण देते हुए इकोसिस्टम को बैलेंस करने की बात कही।
– बीमारी का खतरा: कोर्ट ने ‘डिस्टेंपर’ वायरस का जिक्र करते हुए बताया कि आवारा कुत्तों के जरिए यह बीमारी बाघों तक पहुँच रही है, जो उनके लिए जानलेवा साबित हो रही है।
समाधान पर बहस;
नसबंदी (Sterilization): मेनका गुरुस्वामी ने तर्क दिया कि कुत्तों को मारना समाधान नहीं है, बल्कि नसबंदी ही आबादी नियंत्रण का एकमात्र तरीका है। उन्होंने रेगुलेटरी बॉडी की विफलता को इस समस्या की जड़ बताया।
सार्वजनिक मंच: कोर्ट ने इस बात पर नाराजगी जताई कि यह गंभीर कानूनी मामला अब एक सार्वजनिक बहस का अखाड़ा बनता जा रहा है।
हालांकि,सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े रुख से यह साफ है कि अब आवारा कुत्तों के प्रबंधन की पूरी जिम्मेदारी नगर निकायों और राज्य सरकारों की होगी। साथ ही, कुत्तों को खाना खिलाने वाले लोगों को भी अब उनके व्यवहार के परिणामों के प्रति अधिक सतर्क और जिम्मेदार रहना होगा।