सिटी पोस्ट लाइव
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले, नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने अपने पिता और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को ‘सदी का भगवान’ और ‘भारत का नेल्सन मंडेला’ बताकर एक नया राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है। तेजस्वी का यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और इस पर तीखी प्रतिक्रियाएं भी आ रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान केवल पिता की प्रशंसा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे यादव और कुशवाहा वोट बैंक को साधने की एक सोची-समझी रणनीति है।

तेजस्वी यादव ने अपने पोस्ट में लालू यादव का एक पुराना वीडियो भी साझा किया, जिसमें लालू कहते हैं कि कर्पूरी ठाकुर, राम मनोहर लोहिया और बाबू जगदेव प्रसाद उनके आदर्श थे। इसके साथ ही, तेजस्वी ने जगदेव प्रसाद के हत्यारों को सत्ता से उखाड़ फेंकने की बात कहकर कुशवाहा समाज को भी लुभाने का प्रयास किया है। हालांकि, इस बयान पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं, क्योंकि 1974 में जब जगदेव प्रसाद की हत्या हुई थी, तब बिहार में कांग्रेस की सरकार थी, जो आज राजद की प्रमुख सहयोगी है और लालू यादव उस समय छात्र नेता थे और उन्होंने इस हत्याकांड पर कोई खास विरोध नहीं किया था।
राजनीतिक पंडितों के अनुसार, लालू यादव को ‘भगवान’ या नेल्सन मंडेला जैसे महान व्यक्तित्वों से तुलना करना कई मायनों में विवादित है। नेल्सन मंडेला ने रंगभेद के खिलाफ लड़ाई लड़ी और 27 साल जेल में बिताए, लेकिन उन पर कभी भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा। इसके विपरीत, लालू यादव पर चारा घोटाले सहित कई मामलों में भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं और उन्हें जेल भी जाना पड़ा है। इसी तरह, जिन नेताओं (लोहिया, कर्पूरी, जगदेव प्रसाद) को लालू अपना आदर्श बताते हैं, उनके परिवारों ने कभी राजनीति को अपनी व्यक्तिगत संपत्ति नहीं समझा। लोहिया का परिवार राजनीति से दूर है, जबकि कर्पूरी ठाकुर के बेटे रामनाथ ठाकुर जदयू से होते हुए अब भाजपा सरकार में मंत्री हैं। जगदेव प्रसाद के बेटे नागमणि भी हाल ही में भाजपा में शामिल हुए हैं।
जानकारों का कहना है कि तेजस्वी यादव का यह बयान यादव वोट बैंक में संभावित सेंधमारी के डर को दर्शाता है। यह एक ऐसा कदम है जिसके जरिए वह अपने कोर वोटबैंक को एकजुट रखने की कोशिश कर रहे हैं। जगदेव प्रसाद का नाम लेकर तेजस्वी कुशवाहा समुदाय को भी अपनी तरफ खींचना चाहते हैं, जो बिहार में एक महत्वपूर्ण वोटबैंक है।
कुल मिलाकर, तेजस्वी का यह पोस्ट सिर्फ एक भावुक बयान नहीं, बल्कि आगामी चुनाव से पहले पिछड़े वर्गों के वोट बैंक को साधने का एक राजनीतिक दांव है। इस बयान पर सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह अपने स्वार्थ के लिए इतिहास को मोड़ने का प्रयास है और क्या नेल्सन मंडेला या लोहिया जैसे आदर्शों की तुलना किसी भी राजनेता से करना उनके सिद्धांतों का अपमान नहीं है।