बिहार के मधुबनी जिला न्यायालय में महिला वकीलों की स्थिति महिला सशक्तिकरण के बड़े-बड़े दावों पर गहरा सवाल उठाती है। यहां बुनियादी सुविधाओं का अभाव इतना गंभीर है कि महिला अधिवक्ताओं को चैंबर तो दूर, शौचालय और पीने के पानी जैसी न्यूनतम व्यवस्थाएं भी उपलब्ध नहीं हैं।

दरअसल, करीब 28 वर्षों से वकालत कर रहीं अधिवक्ता अनीता झा (उम्र लगभग 57 वर्ष) इसका सबसे मार्मिक उदाहरण हैं। उन्होंने 2012-13 में महिलाओं के लिए बनाए गए एक साझा चैंबर/कॉमन रूम का जिक्र किया, जिसका साइनबोर्ड कुछ ही दिनों में हटा दिया गया और जगह पर वरिष्ठ पुरुष वकीलों के नाम की प्लेटें लगा दी गईं। विरोध करने पर उन्हें अपमान, फब्तियां, गालियां और धमकियां तक सहनी पड़ीं। वहीं, हिम्मत नहीं हारी अनीता ने आखिरकार अपनी सफेद टाटा टियागो कार को ही अपना मोबाइल ऑफिस बना लिया। पिछले 13 वर्षों से हर कार्य दिवस पर वे अपने ककरौल गांव से लगभग 12 किलोमीटर का सफर तय कर कोर्ट पहुंचती हैं। सुबह 10 बजे से शाम करीब 5 बजे तक कार की पिछली सीट पर ही बैठकर मुवक्किलों से मुलाकात करती हैं फिर केस की फाइलें तैयार करती हैं। और कानूनी सलाह देती हैं। साथ ही कोर्ट रूम में बहस के लिए जाते समय तैयार होती हैं।

हालांकि, यह उनके लिए सिर्फ मजबूरी नहीं, बल्कि लैंगिक भेदभाव के मूक लेकिन दृढ़ विरोध का प्रतीक भी बन चुका है। कोर्ट परिसर में महिला वकीलों के लिए न तो अलग बैठने की जगह है और न ही सुरक्षित, निजी शौचालय की व्यवस्था। पुरुष वकीलों के बीच काम करने में अक्सर असहज और अपमानजनक स्थितियों का सामना करना पड़ता है। अनीता झा कहती हैं कि जब न्याय के मंदिर में ही महिला वकील सम्मान और सुरक्षा महसूस नहीं कर पातीं, तो समाज के बाकी हिस्सों में महिलाओं की स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं। बता दें कि यह घटना हाल ही में (जनवरी 2026) मीडिया में आने के बाद सोशल मीडिया पर खूब चर्चा में रही है। कई लोग और महिला अधिकार कार्यकर्ता मधुबनी बार एसोसिएशन व जिला प्रशासन से महिला वकीलों के लिए अलग चैंबर, शौचालय और अन्य बुनियादी सुविधाओं की मांग कर रहे हैं। अनीता झा का यह संघर्ष न केवल व्यक्तिगत हिम्मत की मिसाल है, बल्कि पूरे न्यायिक तंत्र में लैंगिक समानता और बुनियादी अधिकारों की कमी को उजागर करता है।