सीमांचल में ‘MY’ समीकरण पर संकट! ओवैसी की AIMIM बनी महागठबंधन के लिए सबसे बड़ी चुनौती, 15 मुस्लिम बहुल सीटों पर सीधा टकराव

Ritu Raj

सिटी पोस्ट लाइव
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की सरगर्मी के बीच सीमांचल का चुनावी गणित एक बार फिर असुदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM की वापसी से जटिल हो गया है। 2020 के विधानसभा चुनाव में सीमांचल की मुस्लिम बहुल सीटों पर शानदार प्रदर्शन करते हुए पांच सीटें जीतने वाली एआईएमआईएम इस बार भी महागठबंधन (RJD-Congress) के पारंपरिक ‘MY’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी है।

सीमांचल की कुल 24 विधानसभा सीटों में से लगभग 15 मुस्लिम बहुल सीटों पर एआईएमआईएम पूरी ताकत से मैदान में है। पार्टी ने किशनगंज और पूर्णिया में चार-चार, कटिहार में पांच और अररिया में दो प्रत्याशी उतारे हैं। 2020 में एआईएमआईएम ने 14 सीटों पर उम्मीदवार उतारकर महागठबंधन को भारी नुकसान पहुंचाया था, और इस बार भी वही आधार महागठबंधन के समीकरण को ध्वस्त करने की चुनौती दे रहा है।

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ओवैसी का ‘वोट बैंक’ वाला हमला
एआईएमआईएम अपने प्रचार में मुस्लिम मतदाताओं को सीधे तौर पर प्रभावित करने की कोशिश कर रही है। पार्टी के नेता बार-बार यह बात दोहरा रहे हैं कि आरजेडी और कांग्रेस ने मुसलमानों को हमेशा केवल ‘वोट बैंक’ की तरह इस्तेमाल किया है।

ओवैसी की पार्टी यह सवाल प्रमुखता से उठा रही है कि “जब दो प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले उपमुख्यमंत्री बन सकते हैं, तो 18 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले राज्य में मुख्यमंत्री क्यों नहीं बन सकते?” मुस्लिम मतदाताओं की इस नाराजगी को अपनी दिशा में मोड़ने की यह कोशिश महागठबंधन की मुश्किलें बढ़ा सकती है, खासकर उन सीटों पर जहां मुस्लिम आबादी निर्णायक भूमिका में है।

कोचाधामन से अमौर तक त्रिकोणीय मुकाबले
सीमांचल की कई सीटों पर मुकाबला इस बार चौतरफा या त्रिकोणीय हो गया है:

कोचाधामन (किशनगंज): लगभग 68 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाली इस सीट पर मुकाबला रोचक है। यहां एआईएमआईएम ने सरवर आलम पर भरोसा जताया है, जबकि राजद ने जदयू से आए मुजाहिद आलम को उतारा है।

बहादुरगंज (किशनगंज): यहां एआईएमआईएम के तौसीफ आलम और कांग्रेस के मुसब्बिर आलम आमने-सामने हैं।

अमौर (पूर्णिया): 2020 में एआईएमआईएम के अख्तरूल ईमान यहां 52 हजार से अधिक वोटों से जीते थे। इस बार भी वह मैदान में हैं, जिससे कांग्रेस और जदयू के साथ सीधा त्रिकोणीय मुकाबला बन गया है।

बायसी (पूर्णिया): 2020 की विजेता सीट होने के बावजूद, यहां से विधायक रहे रूकनुद्दीन अब राजद में हैं। एआईएमआईएम ने गुलाम सरवर को उतारकर भाजपा और राजद के साथ मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है।

जोकीहाट (अररिया): यहां लड़ाई सबसे दिलचस्प है, जहां दिवंगत नेता तस्लीमुद्दीन के दोनों बेटे (राजद से शाहनवाज आलम और जनसुराज से सरफराज आलम) आमने-सामने हैं। इनके साथ एआईएमआईएम के मुर्शीद आलम और जदयू के मंजर आलम भी मैदान में हैं, जिससे लड़ाई चौतरफा हो गई है।

कटिहार और अररिया की अन्य मुस्लिम बहुल सीटों पर भी एआईएमआईएम ने उम्मीदवार उतारकर महागठबंधन के वोट बैंक में सेंध लगाने की रणनीति बनाई है। सीमांचल में एआईएमआईएम की मजबूत उपस्थिति यह तय करती है कि बिहार 2025 का चुनावी नतीजा सिर्फ ‘तेजस्वी बनाम एनडीए’ नहीं होगा, बल्कि ओवैसी फैक्टर भी सत्ता की चाबी तय करने में निर्णायक भूमिका निभाएगा।

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