चुनाव में NOTA का क्या है असली मतलब? क्या वोट बेकार जाता है या बदलता है गेम? पढ़ें पूरी रिपोर्ट…

Ritu Raj

पश्चिम बंगाल समेत पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। मतदान के दौरान ईवीएम पर एक विकल्प “NOTA” भी दिखाई देता है, जिसका मतलब होता है “इनमें से कोई नहीं।” यह विकल्प मतदाताओं को सभी उम्मीदवारों को नकारने का अधिकार देता है। लेकिन सवाल यह है कि अगर NOTA को सबसे ज्यादा वोट मिल जाएँ, तो क्या चुनाव रद्द हो जाता है? आइए समझते हैं। भारत की चुनाव प्रणाली में NOTA को किसी उम्मीदवार के रूप में नहीं माना जाता। यह सिर्फ मतदाताओं के असंतोष को व्यक्त करने का एक माध्यम है। यानी, भले ही NOTA को सबसे अधिक वोट मिलें, इसे जीत नहीं माना जाता।

फिर कौन बनता है विधायक (MLA)?
चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार, NOTA के वोटों को विजेता तय करने में शामिल नहीं किया जाता। ऐसे में, वास्तविक उम्मीदवारों में से जिस उम्मीदवार को सबसे ज्यादा वोट मिले होते हैं (भले ही वह कुल वोटों में दूसरे स्थान पर हो), वही विजेता घोषित किया जाता है। सरल शब्दों में, NOTA के आगे रहने पर भी दूसरे नंबर वाला उम्मीदवार ही MLA बनता है।

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क्या चुनाव रद्द हो सकता है?
लोकसभा और विधानसभा चुनावों में, NOTA को सबसे ज्यादा वोट मिलने पर भी चुनाव रद्द नहीं होता। अभी तक ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है जो NOTA के आधार पर चुनाव को अमान्य घोषित करे। हालांकि, कुछ राज्यों जैसे महाराष्ट्र और हरियाणा के स्थानीय निकाय चुनावों में नियम अलग हो सकते है। वहाँ NOTA को बहुमत मिलने पर पुनः चुनाव कराने की व्यवस्था है।

NOTA का उद्देश्य क्या है?
NOTA की शुरुआत 2013 में आए एक महत्वपूर्ण सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हुई थी। इसका मकसद मतदाताओं को अपनी असहमति दर्ज कराने का अधिकार देना है। हालांकि इससे सीधे चुनाव परिणाम नहीं बदलते, लेकिन ज्यादा संख्या में NOTA वोट राजनीतिक दलों के लिए जनता के असंतोष का संकेत होते हैं।

कानूनी बहस जारी;
NOTA को लेकर अब भी चर्चा जारी है। 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सरकार से जवाब मांगा था, जिसमें यह मांग की गई थी कि अगर NOTA को बहुमत मिले, तो चुनाव रद्द कर दिए जाएँ और अस्वीकृत उम्मीदवारों को दोबारा चुनाव लड़ने से रोका जाए। फिलहाल इस पर कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है और मौजूदा व्यवस्था लागू है।

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