बिहार में वोटिंग के बाद कहां रखी जाती हैं EVM मशीनें? जानिए कैसे होती है चौकसी और किसे मिलती है जाने की इजाजत

Ritu Raj

सिटी पोस्ट लाइव
बिहार में विधानसभा चुनावों के दौरान वोटिंग के बाद सबसे अहम सवाल यही उठता है कि आखिर मतदाता द्वारा डाले गए वोटों वाली EVM मशीनें कहां रखी जाती हैं और उनकी सुरक्षा कैसे होती है। भारत में हर बड़े या छोटे चुनाव में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे नतीजे जल्दी और पारदर्शी तरीके से सामने आते हैं।

भारत में करीब 16 लाख से अधिक EVM का उपयोग किया जाता है, और हर मशीन में लगभग 2000 वोट डाले जा सकते हैं। EVM दो हिस्सों में बंटी होती है — कंट्रोल यूनिट और बैलेट यूनिट। कंट्रोल यूनिट पीठासीन अधिकारी के पास रहती है, जबकि बैलेट यूनिट मतदान कक्ष में रखी जाती है। मतदान शुरू होने से पहले अधिकारियों द्वारा उम्मीदवारों और उनके एजेंट्स की मौजूदगी में मॉक पोल किया जाता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि मशीनें सही काम कर रही हैं।

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वोटिंग खत्म होने के बाद चुनाव अधिकारी कंट्रोल यूनिट का ‘क्लोज बटन’ दबाते हैं, जिसके बाद कोई भी नया वोट डालना नामुमकिन हो जाता है। इसके बाद कंट्रोल यूनिट को बैलेट यूनिट से अलग कर सील कर दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान सभी उम्मीदवारों के पोलिंग एजेंट मौजूद रहते हैं और उन्हें डाले गए कुल वोटों की जानकारी दी जाती है।

मतदान के बाद सभी EVM मशीनों को ‘स्ट्रॉन्ग रूम’ में रखा जाता है, जहां उनकी सुरक्षा के लिए तीन स्तर की निगरानी होती है। उम्मीदवारों या उनके अधिकृत प्रतिनिधियों को स्ट्रॉन्ग रूम के ताले पर अपनी सील लगाने की अनुमति दी जाती है। जब तक नतीजों की तारीख नहीं आती, तब तक मशीनें वहीं रहती हैं।

पर्यवेक्षकों, उम्मीदवारों और एजेंट्स की मौजूदगी में स्ट्रॉन्ग रूम खोला जाता है और मशीनों को काउंटिंग सेंटर भेजा जाता है। मशीनों के ट्रांसपोर्ट के दौरान भी उम्मीदवारों के प्रतिनिधियों को साथ चलने की अनुमति होती है, जिससे किसी भी तरह की गड़बड़ी की आशंका न रहे।

स्ट्रॉन्ग रूम के बाहर 24 घंटे सीसीटीवी निगरानी और सुरक्षा बलों की तैनाती रहती है। उम्मीदवारों और उनके समर्थकों को भी वहां निगरानी करने की अनुमति होती है, ताकि चुनाव प्रक्रिया पर जनता का विश्वास बना रहे।

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