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बिहार में राज्यसभा चुनाव 2026 के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपने पत्तों से सस्पेंस हटा दिया है। जहाँ एक ओर नितिन नवीन के नाम की चर्चा पहले से थी, वहीं शिवेश कुमार राम को उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने सभी को हैरान कर दिया है। शिवेश राम को उच्च सदन भेजकर भाजपा ने न केवल एक वफादार कार्यकर्ता को सम्मान दिया है, बल्कि दलित राजनीति के जरिए एक बड़ा सामाजिक संदेश भी दिया है।
सियासत विरासत में, पर पहचान अपनी मेहनत से
शिवेश कुमार राम बिहार की राजनीति में कोई नया चेहरा नहीं हैं, लेकिन उनकी पहचान एक बेहद शांत और जमीनी नेता की रही है। उन्हें राजनीति विरासत में मिली है। उनके पिता मुन्नीलाल भाजपा के दिग्गज नेताओं में शुमार थे। मुन्नीलाल ने ही साल 1996 में पहली बार सासाराम संसदीय सीट पर भाजपा का परचम लहराया था और केंद्र सरकार में मंत्री के रूप में भी अपनी सेवाएं दी थीं। पिता के पदचिह्नों पर चलते हुए शिवेश ने भी एक साधारण कार्यकर्ता के रूप में भाजपा से अपना सफर शुरू किया।
विधायक से लेकर प्रदेश महामंत्री तक का सफर
शिवेश राम की राजनीतिक सक्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने संगठन और सदन दोनों जगहों पर अपनी उपयोगिता साबित की है:
विधायक: साल 2010 में उन्होंने भोजपुर जिले की सुरक्षित सीट अगीआंव (Agiaon) से भाजपा के टिकट पर जीत दर्ज की और विधायक बने।
संगठन में कद: वे वर्तमान में बिहार भाजपा के प्रदेश महामंत्री की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
लोकसभा चुनाव: हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था, लेकिन पार्टी ने उनकी निष्ठा और दलित समाज पर उनकी पकड़ को देखते हुए उन्हें राज्यसभा भेजने का फैसला किया।
BJP का ‘सोशल इंजीनियरिंग’ फॉर्मूला
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शिवेश राम को चुनकर भाजपा ने बिहार में ‘दलित कार्ड’ खेला है। लोकसभा चुनाव में मिली हार के बावजूद उन पर भरोसा जताना यह दर्शाता है कि पार्टी अपने पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं को अधर में नहीं छोड़ती। बिहार विधानसभा के मौजूदा संख्याबल को देखते हुए शिवेश राम और नितिन नवीन दोनों का निर्विरोध चुना जाना लगभग तय माना जा रहा है।
भाजपा के राष्ट्रीय सचिव अरुण सिंह द्वारा जारी इस सूची ने साफ कर दिया है कि पार्टी अब 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों के लिए अपना कोर वोट बैंक मजबूत करने में जुट गई है।