सिटी पोस्ट लाइव
पटना। जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष और एनएसयूआई के राष्ट्रीय प्रभारी कन्हैया कुमार इन दिनों बिहार में अपनी “नौकरी दो, पलायन रोको” पदयात्रा निकाल रहे हैं। यह यात्रा पश्चिम चंपारण के भितिहरवा आश्रम से शुरू हुई, जहां से कभी महात्मा गांधी ने सत्याग्रह की शुरुआत की थी। महज 12 दिनों में ही कन्हैया ने बिहार की राजनीति में हलचल मचा दी है। इस यात्रा को कांग्रेस नेतृत्व, खासकर राहुल गांधी और बिहार प्रभारी कृष्णा अल्लावरु का पूरा समर्थन मिल रहा है। उनकी बढ़ती लोकप्रियता ने कई राजनीतिक चेहरों को बेचैन कर दिया है, जिनमें विपक्षी दलों के साथ-साथ कांग्रेस के अंदर के भी लोग शामिल हैं।
कन्हैया से असहज नेता कौन-कौन?

1. लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव
राजद सुप्रीमो लालू यादव और उनके बेटे तेजस्वी यादव सबसे पहले कन्हैया कुमार के उभरने से असहज महसूस कर रहे हैं। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व में लालू यादव की पकड़ के कारण ही बेगूसराय के निवासी होने के बावजूद कन्हैया को बिहार कांग्रेस में कोई जगह नहीं दी गई थी। तेजस्वी उन्हें एक सियासी प्रतिद्वंदी मानते हैं और उन कार्यक्रमों से भी दूरी बनाते रहे हैं, जहां कन्हैया मौजूद होते हैं। उदाहरण के लिए, प्रजापति सम्मेलन में तेजस्वी केवल इसलिए शामिल नहीं हुए क्योंकि कन्हैया वहां मेहमान थे।

2. प्रशांत किशोर
जनसुराज अभियान के प्रमुख प्रशांत किशोर, जो बिहार में युवाओं के लिए एक उम्मीद बनकर उभरे थे, अब कन्हैया की एंट्री से नई चुनौती महसूस कर रहे हैं। अपनी पदयात्रा और बीपीएससी रीएग्जाम आंदोलन के माध्यम से प्रशांत किशोर ने युवाओं का भरोसा जीतना शुरू किया था, लेकिन अब कन्हैया भी सरकार पर तीखे हमले बोलकर युवाओं को आकर्षित कर रहे हैं। शायद यही कारण है कि हाल ही में गोपालगंज में प्रशांत किशोर ने कन्हैया को खुला चैलेंज दिया, यह देखने के लिए कि क्या वह तेलंगाना के सीएम रेवंत रेड्डी के खिलाफ़ बयान दे सकते हैं, जिन्होंने बिहारियों को मजदूरी करने वाला बताया था।

3. पप्पू यादव
पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव कन्हैया के मित्र माने जाते हैं, लेकिन हाल ही में एक इंटरव्यू में जब उनसे पूछा गया कि क्या कन्हैया बिहार में कांग्रेस के “मास लीडर” बन सकते हैं, तो उन्होंने सीधा जवाब देने से बचते हुए कहा कि बिहार में ऊंची जातियों के नेता-कार्यकर्ता ज्यादा हैं, लेकिन कोई भी “मास लीडर” ओबीसी या ईबीसी समुदाय से ही हो सकता है। चूंकि कन्हैया अगड़ी जाति से आते हैं, इसलिए पप्पू यादव ने अप्रत्यक्ष रूप से उनकी दावेदारी को कमजोर कर दिया।

4. डॉ. अखिलेश प्रसाद सिंह
बिहार कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष डॉ. अखिलेश प्रसाद सिंह, जो लालू यादव के करीबी माने जाते हैं, ने कभी खुलकर कन्हैया के खिलाफ कुछ नहीं कहा। लेकिन उनके राजद से नजदीकी संबंध जगजाहिर हैं। हाल ही में, अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद उन्होंने खुद स्वीकार किया कि लालू प्रसाद ही उनके राजनीतिक गुरु हैं। ऐसे में, यह तय है कि जो लालू को पसंद नहीं, वह डॉ. अखिलेश को भी पसंद नहीं।
क्या कन्हैया कांग्रेस का नया चेहरा बनेंगे?
बिहार में कन्हैया की बढ़ती लोकप्रियता ने कई राजनीतिक समीकरण बदलने शुरू कर दिए हैं। कांग्रेस के अंदर और बाहर कई बड़े नेताओं को उनकी तेज राजनीतिक रफ्तार परेशान कर रही है। हालांकि, यह तय है कि आने वाले चुनावों में उनका प्रभाव कांग्रेस और बिहार की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।