भारत में हर चुनाव के साथ EVM और VVPAT लोकतंत्र की सटीकता और पारदर्शिता के प्रतीक बन चुके हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन मशीनों का क्या होता है जब इनका कार्यकाल पूरा हो जाता है? दरअसल, हर तकनीकी उपकरण की तरह इसकी भी एक तय सेवा अवधि होती है, जिसके बाद इन्हें सुरक्षित तरीके से डिस्पोज कर दिया जाता है। चुनाव आयोग एक सख्त और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत इन मशीनों को नष्ट करता है ताकि उनका किसी भी तरह से दुरुपयोग न हो सके। आइए जानते हैं, क्या होती है यह प्रक्रिया और क्यों जरूरी है ऐसा करना।
भारत में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की रीढ़ माने जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) और वोटर वेरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) का औसत जीवन काल लगभग 15 वर्ष होता है। यह अवधि निर्माता कंपनियों-भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) और इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (ईसीआईएल) द्वारा निर्धारित तकनीकी मानकों पर आधारित है। सेवा काल पूरा होने पर चुनाव आयोग इन मशीनों को अप्रचलित घोषित करता है, जिसके बाद प्रतिस्थापन और सुरक्षित निपटान की औपचारिक प्रक्रिया आरंभ होती है। यह कदम न केवल तकनीकी विश्वसनीयता सुनिश्चित करता है, बल्कि चुनावी प्रक्रिया की अखंडता को भी मजबूत बनाता है।
तकनीकी अपडेट और सुरक्षा की अनिवार्यता:
ईवीएम प्रौद्योगिकी निरंतर विकसित हो रही है, ठीक उसी प्रकार जैसे स्मार्टफोन या कंप्यूटर में होता है। पुरानी पीढ़ी की मशीनों (जैसे एम1 मॉडल) में नई एम3 या एम4 श्रेणी की उन्नत सुविधाओं का अभाव होता है, जिसमें तेज प्रोसेसिंग स्पीड, मजबूत एन्क्रिप्शन और साइबर खतरों से बेहतर सुरक्षा तंत्र शामिल हैं। चुनाव आयोग द्वारा समय-समय पर जारी दिशानिर्देशों के अनुसार, पुरानी मशीनों का उपयोग भविष्य के चुनावों में जोखिमपूर्ण सिद्ध हो सकता है। इसलिए, इनका निपटान अनिवार्य हो जाता है ताकि केवल प्रमाणित और अपडेटेड उपकरण ही मतदान केंद्रों पर तैनात किए जा सकें।
निपटान की सुरक्षा और रोकथाम:
ईवीएम को ‘वन-टाइम प्रोग्रामेबल’ (ओटीपी) चिप्स से सुसज्जित किया जाता है, जिसके कारण निर्माण के बाद डेटा में कोई संशोधन असंभव है। फिर भी, सेवा अवधि समाप्ति के बाद इन मशीनों को नष्ट करना आवश्यक है। निपटान प्रक्रिया में मशीनों को यांत्रिक रूप से कुचलना, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स को अलग करना और धातु भागों को पुनर्चक्रण के लिए भेजना शामिल होता है। यह कदम किसी संभावित छेड़छाड़, डेटा निकासी या अवैध पुन:उपयोग को पूर्णत: अवरुद्ध करता है। चुनाव आयोग की मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) के तहत, निपटान प्रमाणित एजेंसियों द्वारा पर्यवेक्षणीय वातावरण में किया जाता है, जिसमें वीडियो रिकॉर्डिंग और स्वतंत्र ऑडिट अनिवार्य होते हैं।
रखरखाव और भंडारण की चुनौतियां:
भारत जैसे विशाल देश में लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए लाखों ईवीएम तथा वीवीपीएटी की आवश्यकता पड़ती है। पुरानी मशीनों का रखरखाव स्पेयर पार्ट्स की अनुपलब्धता के कारण जटिल एवं महंगा हो जाता है। इसके अतिरिक्त, इनकी सुरक्षित भंडारण सुविधाओं—जैसे तापमान-नियंत्रित गोदाम और सीसीटीवी निगरानी—की मांग संसाधनों पर भारी बोझ डालती है। निपटान से न केवल स्थान मुक्त होता है, बल्कि चुनाव आयोग का परिचालन व्यय भी न्यूनतम रहता है, जिससे बजट को नए उपकरणों की खरीद पर केंद्रित किया जा सकता है।