बिहार चुनाव 2025 में महागठबंधन का परंपरागत MY (मुस्लिम–यादव) वोट बैंक क्यों कमजोर पड़ा? इसके प्रमुख कारण क्या रहे?…

Ritu Raj

बिहार चुनाव 2025 में आरजेडी का सबसे मज़बूत माना जाने वाला MY (मुस्लिम–यादव) समीकरण पहली बार बड़े पैमाने पर बिखरता दिखा। 14% यादव और 18% मुस्लिम आबादी पर भरोसा करके तेजस्वी यादव पूरे आत्मविश्वास के साथ मैदान में उतरे थे, लेकिन नतीजों ने साफ कर दिया कि ज़मीन पर समीकरण बदल चुका है। मोदी–नीतीश की नई राजनीतिक धुरी ने MY की पकड़ तोड़ी और इसका सबसे बड़ा झटका आरजेडी को उसके ही कोर वोट बैंक यादव बहुल सीटों पर लगा, जहाँ 2020 की तुलना में पार्टी लगभग आधी रह गई।

राजद ने इस बार 144 सीटों में से 51 पर यादव उम्मीदवार उतारे, लेकिन अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। वहीं एनडीए ने 23 यादव प्रत्याशी दिए और उनमें से 15 जीतकर निकले, जो यादव वोटों में स्पष्ट ध्रुवीकरण दिखाता है। राजद की हार की वजह कई सीटों पर यादव उम्मीदवारों की आक्रामक चुनावी शैली भी बताई जा रही है, जिसने स्थानीय स्तर पर नाराज़गी बढ़ाई। लालू प्रसाद के मजबूत माने जाने वाले अति पिछड़ा वर्ग (EBC) भी इस चुनाव में राजद से दूरी बनाते दिखे। सबसे बड़ा झटका मुस्लिम प्रतिनिधित्व में गिरावट के रूप में सामने आया। आज़ादी के बाद पहली बार केवल 11 मुस्लिम विधायक जीते, जिनमें से पांच AIMIM के हैं। जदयू द्वारा दिए गए चार टिकटों में से सिर्फ मंत्री जमां खान जीत सके। वहीं, राजद ने 18 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे लेकिन केवल तीन ही विजयी हुए। कांग्रेस के दस टिकटों में से सिर्फ दो मुस्लिम उम्मीदवार जीत पाए और पार्टी के दिग्गज शकील अहमद भी कदवा सीट हार गए। माले द्वारा उतारे गए दो मुस्लिम उम्मीदवार भी चुनाव नहीं जीत सके। यहां तक कि 2020 में सबसे बड़ी जीत दर्ज करने वाले महबूब आलम भी इस बार बलरामपुर से हार गए।

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हालांकि, इन नतीजों ने बिहार की राजनीति में एक बड़ा संदेश दे दिया है। जहाँ महागठबंधन का पारंपरिक MY (मुसलमान–यादव) मॉडल ढहता दिखा, वहीं एनडीए का नया MY (महिला–युवा) फॉर्मूला निर्णायक साबित हुआ। महागठबंधन के मुस्लिम और यादव विधायकों की संख्या सिमटकर क्रमशः 5 और 11 रह जाना उसके आधार वोट की तेज गति से खिसकती तस्वीर पेश करता है। इसके उलट महिला और युवा वर्ग में एनडीए की बढ़ती पैठ ने उसे रिकॉर्ड 202 सीटों पर पहुँचा दिया। उधर, मुस्लिम बहुल इलाकों में AIMIM की सक्रिय मौजूदगी और आक्रामक अभियान ने पारंपरिक वोटों में बड़ी सेंध लगा दी, जिसका सीधा नुकसान महागठबंधन को उठाना पड़ा। कुल मिलाकर यह चुनाव बताता है कि बिहार का राजनीतिक समीकरण अब पुराने जातीय फार्मूलों पर नहीं, बल्कि नए सामाजिक समूहों की तरफ झुकता दिखाई दे रहा है।

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