बिहार की सियासत में इन दिनों ‘दही-चूड़ा’ की मिठास कम और बयानों की तल्खी ज्यादा चर्चा में है। आरसीपी सिंह (RCP Singh) की जदयू में वापसी की सुगबुगाहट ने पार्टी के भीतर एक पुराने जख्म को फिर से हरा कर दिया है।
पटेल भवन का वह ‘खामोश’ इशारा;
11 जनवरी को पटेल सेवा संघ के कार्यक्रम में नीतीश कुमार और आरसीपी सिंह एक ही छत के नीचे थे। भले ही दोनों की नजरें न मिली हों, लेकिन आरसीपी के सुर बदले-बदले नजर आए। नीतीश कुमार को “अभिभावक” बताना और उनके काम को “ऐतिहासिक” कहना, सियासी गलियारों में घर वापसी की अर्जी के तौर पर देखा गया। जब उनसे पूछा गया कि क्या वे लौट रहे हैं, तो उनका जवाब था— “जल्द पता चल जाएगा।”
ललन सिंह का ‘नॉन-नेगोशिएबल’ वीटो:
जदयू में जहां श्याम रजक जैसे नेता आरसीपी के लिए रेड कारपेट बिछा रहे हैं, वहीं केंद्रीय मंत्री ललन सिंह ने कड़ा पहरा लगा दिया है। ललन सिंह ने सीधे तौर पर 2020 की चुनावी हार का ठीकरा आरसीपी पर फोड़ते हुए कहा— “पार्टी को 72 से 42 पर लाने वालों के लिए कोई जगह नहीं।” यह बयान सिर्फ तल्खी नहीं, बल्कि नीतीश कुमार को उस ‘धोखे’ की याद दिलाने की कोशिश है, जिसका आरोप आरसीपी पर लगता रहा है।
आरसीपी सिंह: खोई हुई जमीन की तलाश?
हकीकत यह है कि जदयू से अलग होने के बाद आरसीपी सिंह की राजनीतिक पारी ढलान पर रही है।
– भाजपा के साथ उनका तालमेल लंबा नहीं चला।
– अपनी पार्टी बनाई, जिसका कोई खास असर नहीं दिखा।
– बेटी की चुनावी हार ने साबित किया कि बिना नीतीश के साथ के उनकी ‘सियासी जमीन’ दरक चुकी है। ऐसे में जदयू में वापसी उनके लिए ‘सियासी अस्तित्व’ बचाने की मजबूरी ज्यादा लगती है।
नीतीश कुमार की ‘वेट एंड वॉच’ नीति:
जदयू में अंतिम फैसला हमेशा ‘नीतीश कुमार’ का होता है। फिलहाल नीतीश खामोश हैं। उनके पास दो चुनौतियां हैं:
क्या आरसीपी को वापस लाकर वे पार्टी में एक और ‘पावर सेंटर’ खड़ा करेंगे?
क्या वे ललन सिंह और अपने कोर ग्रुप की नाराजगी मोल लेंगे?
फिलहाल ऐसा लग रहा है कि आरसीपी सिंह के लिए जदयू के दरवाजे ‘आधे खुले’ और ‘आधे बंद’ हैं। आरसीपी सिंह भावनात्मक कार्ड खेल रहे हैं, जबकि ललन सिंह आंकड़ों के जरिए घेराबंदी कर रहे हैं। नीतीश कुमार की चुप्पी इस बात का संकेत है कि अभी ‘सौदा’ पटरी पर नहीं आया है। वहीं, बिहार की राजनीति में कहा जाता है— “नीतीश के मन में क्या है, यह खुदा भी देर से जानता है।”