वोट डालने के बाद उंगली पर जो निशान दिखता है, उसकी कहानी जानकर चौंक जाएंगे!…

Ritu Raj

भारत की चुनावी व्यवस्था में मतदाता स्याही सिर्फ एक रासायनिक मिश्रण नहीं, बल्कि भरोसे की पहचान है। यह वही बैंगनी निशान है जो बताता है कि “एक वोट, एक व्यक्ति” का सिद्धांत कितनी मजबूती से लागू है। 1962 में पहली बार इस्तेमाल की गई यह इंडेलिबल इंक आज 90 से ज्यादा देशों में लोकतंत्र की रक्षा कर रही है। इसे बनाती है मैसूर की सरकारी कंपनी- मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड (MPVL) और इसकी सटीक फॉर्मूला दुनिया में सिर्फ भारत के पास है। वोट डालने के बाद उंगली पर लगने वाला यह अमिट निशान भले कुछ दिनों बाद फीका पड़ जाए, लेकिन इसका संदेश हमेशा कायम रहता है।

भारत में जब भी चुनाव होते हैं, तो हर वोटर की पहचान एक छोटी सी स्याही की लाइन से होती है। यह कोई साधारण निशान नहीं, बल्कि लोकतंत्र की ईमानदारी का सबूत है। बाएं हाथ की तर्जनी पर लगाई जाने वाली यह स्याही दुनिया के सामने भारत की चुनावी पारदर्शिता की पहचान बन चुकी है। इसे कहा जाता है अमिट स्याही या Indelible Ink, यानी ऐसी स्याही जो चाहे जितना रगड़ो, पानी या केमिकल से धो डालो, फिर भी मिटे नहीं। शुरू में यह बैंगनी रंग की दिखती है, लेकिन कुछ घंटों बाद धीरे-धीरे काली पड़ जाती है। भारत में इस खास स्याही का उत्पादन केवल दो जगहों पर होता है। इसमें मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड (Mysore Paints & Varnish Ltd), कर्नाटक और रायुडू लेबोरेटरी, हैदराबाद, तेलंगाना शामिल है। वहीं, इनमें से मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड की स्याही का इस्तेमाल भारत के हर चुनाव में किया जाता है। वहीं रायुडू लेबोरेटरी की स्याही विदेशों में भेजी जाती है। यह वही भारतीय स्याही है, जो अब तक लगभग 90 देशों में चुनावों का हिस्सा बन चुकी है। इनमें थाईलैंड, मलेशिया, तुर्की, दक्षिण अफ्रीका, नेपाल जैसे कई देश शामिल हैं। भारत की यह तकनीक न केवल घरेलू चुनावों को सुरक्षित बनाती है, बल्कि वैश्विक स्तर पर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता बढ़ाती है।

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इतिहास और महत्व: स्वतंत्रता के बाद का नवाचार:
भारत में अमिट स्याही का इस्तेमाल 1952 के पहले आम चुनाव से शुरू हुआ। यह विचार मूल रूप से भारतीय निर्वाचन आयोग और वैज्ञानिकों की देन है, जो मतदाता धोखाधड़ी को रोकने के लिए एक सस्ता और प्रभावी तरीका ढूंढ रहे थे। मैसूर पेंट्स कंपनी (तब सरकारी स्वामित्व वाली) को 1962 में इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई। आज यह कंपनी चुनाव आयोग के लिए सालाना लाखों शीशियां उत्पादित करती है – हर शीशी में 10 मिलीलीटर स्याही, जो करीब 700 वोटरों के लिए काफी होती है।

दरअसल, यह स्याही कोई साधारण काला रंग नहीं बल्कि यह सिल्वर नाइट्रेट का घोल है, जो त्वचा पर लगते ही पारदर्शी रहता है। लेकिन सूर्य की पराबैंगनी किरणों से संपर्क में आते ही गहरा बैंगनी हो जाता है, यह रंग कम से कम 48 घंटे तक नहीं मिटता, चाहे साबुन से रगड़ो या अल्कोहल से पोंछो। वैज्ञानिक में इसे फोटोक्रोमिक प्रभाव कहते हैं, जो एक छोटा-सा रासायनिक चमत्कार जो धांधली की हर कोशिश को नाकाम कर देता है। इसके साथ ही मैसूर की रहस्यमयी प्रयोगशाला में, जहां यह स्याही जन्म लेती है, हर बोतल को 10 मिलीलीटर की सटीक मात्रा में भरा जाता है। 2019 में 26 लाख बोतलों का मतलब था 78 करोड़ बूंदें, यानी 78 करोड़ भारतीयों की उंगलियों पर एक ही कहानी लिखी गई है।

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